रविवार, जून 06, 2010

लर्निंग डिसेबिलिटी? ये हैं सोल्यूशन्स!

गभग 30 फीसदी बच्चे लर्निंग डिसेबिलिटी से पीडि़त हैं। इसके बावजूद ज्यादातर पेरेंट्सइस बारे में अवेयर नहीं हैं। इंग्लिश के तकनीकि शब्द अधिक होने के कारण इस आलेख की भाषा कुछ ऐसी हो गई है जैसे अंग्रेजीदां एनजीओज़ द्वारा संचालित स्पेशल स्कूल्स में पेरेंट्स से बोली जाती है। यहां किसी की नकल करने या मजाक उड़ाने की मंशा कतई नहीं है।
बच्चों की ओर से बार-बार गलतियां करने पर पेरेंट्स उसे लापरवाही समझ लेते हैं और उन्हें डांटना शुरू कर देते हैं, जबकि वे इस बात से अन्जान होते हैं कि उनका बच्चा लर्निंग डिसेबिलिटी से पीडि़त है। यह एक जैनेटिक प्रॉब्लम है। एक्सपट्र्स के मुताबिक लगभग 30 फ ीसदी बच्चे इस समस्या से पीडि़त हैं। ऐसे बच्चे अवसर मिलने पर बेहतर परफॉर्म नहीं कर पाते। इसके बावजूद ज्यादातर पेरेंट्स इस बारे में अवेयर नहीं है।
बेस्ट आउटपुट नहीं दे पाता है बच्चा :बच्चा स्कूल या घर में मिलने वाली गाइडलाइन के मुताबिक उम्मीद के मुताबिक बेस्ट रिजल्ट नहीं दे पाता है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रो। और सायकेट्रिस्ट डॉ. ललित बत्रा कहते हैं, लर्निंग डिसेबिलिटी कई तरह की होती है। इसमें जैसे कैल्कुलेशन, ए सप्रेस, राइटिंग, आइडेंटिफाई न कर पाना आदि हैं। डॉ. बत्रा कहते हैं, सही समय पर स्पेशल और डिफ्रेंट एजुकेशन के जरिए बच्चे को सही किया जा सकता है।
नॉर्मल होता है आई क्यू लेवल: लर्निंग डिसेबिलिटी होने पर बच्चों में रीडिंग राइटिंग और कैल्कुलेशन की प्रॉ लम होती है। मेडिकल लैंग्वेज में इन्हें एसेक्सिया, एकेल्कुएलिया और एग्राफिया कहा जाता है। फोर्टिस हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट और लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ। सविता जगावत कहती हैं, यह एक जन्मजात समस्या है। जब तक बच्चों का सामना रीङ्क्षडग या राइटिंग से नहीं होता, तब तक यह समस्या न तो पेरेंट्स के सामने आती है और न ही बच्चों के। अमूमन सेकंड या थर्ड स्टेंडर्ड में यह समस्या शुरू होती है। लर्निंग डिसेबिलिटी होने के कारण वे बोलने, लिखने और पहचानने में कैपेबल नहीं होते। हालांकि उनका आई क्यू लेवल नॉर्मल होता है, लेकिन पूछे गऐ क्वैश्चन का आन्सर देने में बच्चे सक्षम नहीं होते। इसे आर्टिकुलेशन कहा जाता है। इसमें बच्चे को नए वर्ड और स्पेलिंग्स समझने में दिक्कत आती है। इसमें स्पेशल एजुकेटर डिफ्रेंट तरीके और प्रैक्टिकल मैथड से बच्चों को पढ़ाते हैं।
पेरेंट्स का ध्यान देना जरूरी : ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों के लर्निंग डिसएबिलिटी से पीडि़त होने की बात समझ नहीं पाते। मॉडर्न सोसायटी और हैक्टिक वर्क शेड्यूल के चलते आजकल पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता, जबकि लर्निग डिसएबिलिटी से पीडि़त बच्चों को पेरेंट्स के एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है। यदि पेरेंट्स धैर्य और समझदारी से काम लें तो काफी हद तक ऐसे बच्चों की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है।
ये हैं सोल्यूशन्स- अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों के साथ न करें। पेरेंट्स का कंपेयरेटिव बिहेवियर उनमे हीन भावना पैदा कर सकता है।
  • पेरेंट्स हालात को समझें। बार-बार डांटने से बच्चा कॉन्फिडेंस खो देता है और निराश हो जाता है। इसलिए उन्हें डांटने के बजाय ह्रश्वयार से पेश आएं।
  • ऐसे बच्चों के इलाज के लिए पीडियाट्रिशियन, सायकियाट्रिस्ट, रेमिडियल एजुकेटर, आक्यूपैशनल थैरेपिस्ट से सजेशन लें। केवल एक व्यक्ति की राय लेकर इलाज शुरू न करें।
  • इलाज के दौरान स्पेशल एजुकेटर से थैरेपी सीखें और फिर बच्चों के साथ समय बिताएं।

बच्चों को मिलती है विशेष छूट: ऐसे बच्चों को गवर्नमेंट की ओर से एग्जाम में विशेष छूट दी जाती है। जैसे एग्जाम में एक्स्ट्रा टाइम मिलना, कैल्कुलेटर का इस्तेमाल, ओरल एग्जाम देना। इसके लिए गवर्नमेंट हॉस्पिटल का सर्टिफिकेट होना जरूरी है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे अपने बच्चों को यह अधिकार जरूर दिलवाए।

ऐसे पहचानें प्रॉब्लम:

  • यदि बच्चा देर से बोलना शुरू करे
  • साइड, शेप व कलर को पहचानने में गलती करे।
  • प्रनन्सिएशन और लिखने में गलती करे।
  • आपकी ओर से दिए गए ऑर्डर्स को याद रखने में उसे मुश्किल महसूस हो।
  • अर्थमेटिक के नंबरों को पहचानने में गलती करे।
  • बटन लगाने या शू के लैस बांधने में दि कत हो।
क्या हैं कारण:
  • लर्निग डिसएबिलिटी एक जैनेटिक प्रॉब्लम है। यदि पेरेंट्स में से किसी एक को यह समस्या है, तो बच्चों में इसके होने की आशंका अधिक होती है।
  • बच्चे के जन्म के समय सिर पर चोट लगने या घाव होने के कारण भी डिसएबिलिटी हो सकती है।
  • जो बच्चे प्रीमैच्योर होते हैं या जन्म के बाद जिनमें कुछ मेडिकल प्रॉब्लम होती है।

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