मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

पुत्र पैदा नहीं कर पाती प्रदूषण झेलने वाली महिलाएं


विशेष प्रकार का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलने वाली महिलाएं लड़के को जन्म नहीं दे सकतीं। सान फ्रांसिस्को में गर्भवती महिलाओं पर किए गए एक शोध से यह बात निकलकर सामने आई है। विज्ञान समाचार पत्र 'साइंसडेली' में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं 'पॉलीक्लोरिनेटेड बाईफिनाइल्स' (पीसीबी) का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलती हैं, उनमें लड़कों को जन्म देने की क्षमता काफी कम हो जाती है।

गौरतलब है कि पीसीबी पर 1950 और 1960 के दशक में प्रतिबंध लगा दिया गया था। पीसीबी कारखानों में बिजली उपकरणों कूलिंग (शीतलक) के तौर पर उपयोग में लाए जाते हैं। इनका उपयोग वॉरनिश और चाक बनाने में भी होता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पीसीबी बच्चों में लिंग अनुपात को प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं पीसीबी का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलती हैं, उनमें लड़कों को जन्म देने की क्षमता 33 फीसदी कम हो जाती है।

लेकिन, पुत्र का मतलब सब कुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं होता, बेटे को जन्म देने के बाद माताएं अपेक्षाकृत अधिक तनाव में रहने लगती हैं। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

गर्भावस्था में संगीत से शान्ति


क्या गर्भावस्था का संगीत से कोई रिश्ता हो सकता है? हाल ही में किए गए एक शोध में इस प्रश्न का जवाब 'हां' में दिया गया है। ताईवान के कोहसिउंग चिकित्सा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में गर्भवती महिलाओं को दो समूहों में बांटा। उनमें से 116 को गीत-संगीत वाली सीडी और 120 को सामान्य देखभाल मुहैया कराई गई। इस शोध के अंर्तगत, पहले समूह की महिलाओं को चार-चार सीडी दी गई। पहली सीडी में लुलाबीज के रॉक गीत थे तो दूसरी में बीथोवेन और डेबस्सी का शास्त्रीय संगीत। तीसरी सीडी में कुछ प्राकृतिक ध्वनियां थीं और चौथी में चीन की नर्सरी राइम्स और कुछ गीत शामिल थे।

अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं ने लुल्लाबीज, बीथोवेन और प्राकृतिक ध्वनियों वाली सीडी सुनीं उन्होंने अन्य महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक शांति महसूस की।अध्ययन का नेतृत्व कर रहे शोधकर्ता चुंग-हे चेन ने बताया कि, 'गर्भावस्था का संगीत सगीत सुनने वाली गर्भवती महिलाओं ने अन्य महिलाओं की तुलना में खुद पर दबाव कम महसूस किया।

संगीत से केवल शांति ही नहीं कुछ खास स्थितियों में नर या मादा भ्रूण की भूमिका भी तय होती है। हालांकि हम जानते हैं कि भूण के नर या मादा होने की प्रक्रिया गर्भधारण के समय प्राकृतिक रूप से तय होती है। फिर भी पुत्र या पुत्री जन्म होने के लिए कुछ कारण काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं, कल से इस मसले पर कुछ चर्चा हो सकती है, अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

रविवार, अप्रैल 26, 2009

अत्यधिक व्यायाम करने से भी समस्या

अपने एक नए शोध में शोधकर्ताओं ने कहा है कि गर्भावस्था के दौरान कम से कम व्यायाम करने चाहिए। अत्यधिक व्यायाम करने से काफी समस्या आ सकती है। गौरतलब है कि गर्भावस्था के दौरान व्यायाम करना आवश्यक माना जाता है, लेकिन अत्यधिक व्यायाम खतरनाक साबित हो सकता है। अपने इस नए शोध में शोधकर्ताओं ने कहा है कि महिलाओं को प्रतिदिन गर्भावस्था के दौरान व्यायाम करना चाहिए, लेकिन उतना ही व्यायाम करना चाहिए जितना कि आवश्यक है।

शोधकर्ताओं ने लगभग 90 हजार गर्भवती महिलाओं का साक्षात्कार लिया। इस साक्षात्कार में इन लोगों ने व्यायाम को लेकर अलग-अलग सवाल पूछे। साक्षात्कार में उन महिलाओं को भी शामिल किया गया जो गर्भावस्था के दौरान व्यायाम नहीं करती हैं। इसके साथ ही वैसी गर्भवती महिलाओं से भी बात की गई जो सप्ताह में सात घंटे तक व्यायाम करती हैं। जो महिलाएं सात घंटे से ज्यादा समय व्यायाम और खेल आदि में बिताती हैं, उन्हें गर्भावस्था को लेकर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि इस प्रकार ज्यादा व्यायाम या खेल में समय बिताने से गर्भवती महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि गर्भावस्था के दौरान तैराकी ज्यादा फायदेमंद है। इससे कोई समस्या नहीं आती है। गौरतलब है कि गर्भवती महिलाओं के बीच तैराकी काफी लोकप्रिय माना जाता है। सरकारी विभाग ने भी गर्भवती महिलाओं से इस संबंध में सलाह देते हुए कहा है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक व्यायाम से इन्हें बचना चाहिए। उन्हें उतना ही व्यायाम करना चाहिए जितना कि उनके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

व्यायाम के साथ ही और भी बहुत कुछ है जो गर्भकाल में सहायक होता है। एक स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए संगीत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कल इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या गर्भावस्था का संगीत से कोई रिश्ता हो सकता है? अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

गर्भावस्था में व्यायाम से स्वस्थ बच्चा

गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं नियमित व्यायाम करती हैं वो हमेशा स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे के दौरान यह बात सामने आई।कैनसास सिटी यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन के दौरान यह खुलासा किया कि गर्भावस्था में नियमित व्यायाम करने से गर्भ में पल रहा बच्चा भी स्वस्थ पैदा होता है। इतना ही नहीं इससे बच्चे के फेफड़े और तंत्रिका तंत्र भी मजबूत बनते हैं। इसके साथ ही गर्भ में पल रहे बच्चे को सांस लेने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं होगी अगर मां स्वस्थ रहती है।
अनुसंधानकर्ता लिंडा कहती हैं कि व्यायाम गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ही शुरू कर देना चाहिए इससे बच्चे स्वस्थ और मजबूत होंगे उनका तंत्रिका तंत्र मजबूत होगा और उनके अचानक मरने के दुष्प्रभाव कम हो जाएंगे। यह शोध 20 से 35 वर्ष से ज्यादा उम्र की महिलाओं पर किया गया जिनमें से आधी महिलाओं ने जिन्होंने लगातार चलना, साइकिल चलाना और हफ्ते में तीन बार आधे घंटे के लिए दौडऩा जैसे व्यायाम किए जबकि बाकी की महिलाओं ने कुछ भी नहीं किया। परिणाम के तौर पर जिन महिलाओं ने नियमित व्यायाम किया उन्होंने बाकी महिलाओं की अपेक्षा स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
अति तो हर चीज की वर्जित है, जहां शोधकर्ताओं ने नियमित व्यायाम पर जोर दिया है वहीं यह भी कहा है कि अत्यधिक व्यायाम करने से काफी समस्या आ सकती है। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....
-इति आपकी 'शुभदा'

शुक्रवार, अप्रैल 24, 2009

जीवन भर नशे में रह सकता है आपका बच्चा

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिए शराब का एक पैग उनके गर्भ में पल रहे शिशु के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार शराब सेवन के कारण गर्भावस्था में भ्रूण के विकास पर हानिकारक प्रभाव डाल सकता है।ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन के शोधकर्ता विविनी नाथसन ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को शराब का सेवन कतई नहीं करना चाहिए क्योंकि शराब का एक या दो पैग लेने पर भी भ्रूण के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का विकास अवरूद्ध हो सकता है।शोध रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में भी शराब का सेवन भ्रूण के विकास को अवरूद्ध करने की क्षमता रखता है। इस रिपोर्ट को वैज्ञानिको ने करीब 500 महिलाओं पर अनुसंधान कर तैयार किया है।

शराब तो खैर खराब है ही, बुरी-बुरी बातों को दूर रखकर अगर हम कुछ अच्छी बातों पर चर्चा करें तो और बेहतर होगा। मसलन व्यायाम, पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं नियमित व्यायाम करती हैं वो हमेशा स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंग और चर्चा करेंगे कि क्या जब पैर भारी हो तब व्यायाम करना चाहिए ? अभी इजाजत दें। शेष शुभ -इति, आपकी 'शुभदा'

गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

गर्भावस्था में धूम्रपान दोधारी तलवार

गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करने वाली महिलाओं के नवजात शिशुओं की 'सडन इंफैंट डेथ सिंड्रोम (सिड्स) यानी अचानक शिशु की मौत की आशंका बहुत बढ़ जाती है। कैलगरी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अपनी तरह के इस पहले शोध में पाया गया कि जिन बच्चों की मांओं ने गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान किया था, उनमें श्वसन संबंधी समस्याएं होती हैं।

विश्वविद्यालय में शिशु विभाग के प्रोफेसर शबीह हसन ने बताया, 'गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान दोधारी तलवार की तरह है। इससे न केवल महिलाओं के समय पूर्व प्रसव की आशंका रहती है बल्कि इससे बच्चों के सिड्स का शिकार होने की आशंका भी बढ़ जाती है। हसन ने कहा कि समय पूर्व पैदा हुए बच्चों में श्वसन संबंधी समस्या की आशंका होती है। इससे पहले किए गए अध्ययनों से पता चला था कि कम ऑक्सीजन और अधिक कार्बन डॉयआक्साइड के मिश्रण से सिड्स का खतरा होता है, लेकिन अब तक धूम्रपान और सिड्स के संबंधों पर कोई अध्ययन नहीं हो पाया था।

धूम्रपान के अलावा गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिए शराब का एक पैग भी उनके गर्भ में पल रहे शिशु के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय आपसे फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें।

-इति आपकी 'शुभदा'

सोमवार, अप्रैल 06, 2009

बहुत कुछ 'अन-डू' नहीं हो पाता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के बारे में कोई भी ऊल-जुलूल बोल या लिख देने से कुछ क्षणों के लिए वक्ता या लेखक जरूर चर्चा में आ सकता है या अपने लिखे पर कुछ अतिरिक्त टिप्पणियां पा सकता है, लेकिन वह स्वयं भी जानता है कि उसने ऐसा कर कोई महान कार्य नहीं किया है। मेरा तो मानना है कि अंत: ऐसे में पछतावा ही साथ रह जाता है। अभी आज ही एक बोध कथा पढ़ी, संक्षेप में प्रस्तुत है।

बिना विचारे बोलने वाली एक बातूनी महिला ने एक व्यक्ति को कुर्सी पर बैठ कर बगीचे में पानी डालते देखा। अपनी मंडली में जाकर खूब हंसी उड़ाई। कहा-'आलसीपन की सीमा तो देखो, बागवानी भी कुर्सी पर आराम फरमाते हुए हो रही थी। अगले दिन जब वहीं से गुजरना हुआ तो महिला ने इस बार कुर्सी के पास रखी दो बैसाखियां भी देखी। अपने कल के प्रचार पर उसे बहुत अफसोस हुआ। आदत से मजबूर अगली बार महिला ने एक अन्य पडोसन के बारे में सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी ओर से नमक-मिर्च लगा कर एक रोचक दास्तान प्रचारित की। प्रभावित महिला को भी पता चला, वह मानसिक आघात से बीमार हो गई। कुछ दिनों बाद सभी को पता चला की गलत बात प्रचारित हो गई। बातूनी महिला की बड़ी फजीयत हुई। वह लोकप्रियता की भूखी थी पर दिल से उतनी बुरी नहीं थी।


इस बार वह एक संत के पास गई और हालात में सुधार का उपाय जानना चाहा। संत ने सुझाया कि वह अपने घर से कोई पुरानी कॉपी ले और उसे फाड़ कर उसके पन्ने बाजार के रास्ते पर दूर तक डाल कर आए तो उसे कुछ बताया जाए। महिला ने वैसा ही किया और लौट कर संत के पास आई। इस बार संत ने कहा- 'अब जरा जाकर उन पन्नों को समेट कर ले आओं देखना हर पन्ने पर तुम्हारी समस्या का समाधान लिखा होगा।' महिला हैरान तो हुई, लेकिन संत की बात मान कर पन्ने समेटने निकल पड़ी। पूरे रास्ते सावधानी से तलाशा फिर भी दो-चार पन्ने ही जुटा पाई। बाकी को हवाएं उड़ाकर न जाने कहां से कहां ले गई थी। उसे पन्ने उड़ाने और फैलाने में कोई खास वक्त नहीं लगा था, लेकिन काफी वक्त लगाने के बाद भी उन्हें पूरी तरह समेटना और नुकसान की भरपाई करना असंभव हो गया। माजरा समझने के बाद उसे संत के पास वापस जाने की जरूरत नहीं रह गई थी।


सबक: किसी के बारे में कोई टीका-टिप्पणी करने, कोई फैसला सुनाने या कोई खबर फैलाने से पहले हजार बार सोच लेना चाहिए। अपने एक वाक्य से किसी की पूरी जिन्दगी तबाह हो सकती है। गपबाजी और अफवाहों से हुए नुकसान को पूरी तरह से 'अन-डू' नहीं किया जा सकता।

शुक्रवार, मार्च 27, 2009

ऐसे बढ़ाएं याददाश्त..


कुछ दोस्तों ने पूछा है- क्या शुभदा के पास केवल मानसिक विमंदितों के लिए ही टिप हैं? ऐसा नहीं, आज पेश है, सामान्य लोगों के मानसिक स्वास्थ्य हेतु याददाश्त बढ़ाने के लिए कुछ टिप्स। यदि इनका पालन किया जाए तो दिमाग पहले से ज्यादा तेज हो जाएगा।

रोजमर्रा की जिंदगी में तकनीक के बढ़ते दखल ने हमें बेहद आरामतलब बना दिया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट से जिंदगी आसान तो हुई है लेकिन इसके नुकसान भी हैं। कोई सूचना या रहस्य यदि एक क्लिक की दूरी पर हो, तो कोई क्यों अपने दिमाग को कष्ट देना चाहेगा। लेकिन आगे चलकर ये आदतें विशेष रूप से मस्तिष्क की याद रखने की क्षमता पर घातक असर डाल सकती हैं।

1। करें ब्रेन एक्सरसाइज दिमाग का जितना ज्यादा इस्तेमाल करेंगे वह उतना ही तेज और सक्षम बनेगा। ब्रेन एक्सरसाइज इसी फंडे पर काम करती है। रोज का सामान्य काम जरा सा हटके किया जाए तो आपके दिमाग का हर वह हिस्सा सक्रिय होने लगेगा जिसका पहले इस्तेमाल ही नहीं किया जा रहा था। आंखें बंद करके कपड़े बदलना, कोई नया विषय या नया खेल सीखना। बिजली का स्विच आन करने जैसे काम के लिए सीधे हाथ के बजाय उलटे हाथ का प्रयोग करना जैसे तरीके अपनाकर दिमाग की बंद खिड़कियों को खोल सकते हैं।

2। आठ सेकेंड का ध्यान कोई बात तभी लंबे समय तक याद रहती है जब उस पर ध्यान दिया जाए। जो भी याद रखना है उसे गौर से पढ़े और आगे बढऩे से पहले आठ सेकेंड तक ध्यान केंद्रित करें। फिर देखिए कोई भी चीज कैसे याद नहीं रहती।

३। सीखने का अपना तरीकापहचाने कोई भी चीज याद रखने या सीखने का हर किसी का अपना तरीका होता है। कुछ लोग बेहतर विजुअल लर्नर होते हैं। यह वे लोग होते हैं जो किसी चीज को देखकर या पढ़कर सीखते हैं। वहीं कुछ लोग बेहतर आडियो लर्नर होते हैं जो सुनकर सीखते हैं। आपके लिए कौन सा तरीका सुविधाजनक है इसे पहचाने और याद रखने के लिए उसी का इस्तेमाल करें।

4. करें इंद्रियों का ज्यादा इस्तेमाल चाहे आप विजुअल लर्नर ही क्यों न हो याद रखने के लिए बोल कर पढ़ें। कविता की तरह याद करने की कोशिश करेंगे तो और भी अच्छा होगा। जानकारी को किसी रंग, सुगंध, स्वाद से जोड़कर याद रखने की आदत डालें।

5. नई जानकारी को किसी पुरानी जानकारी से जोड़कर याद रखने का प्रयास करें।

6. व्यवस्थित तरीके से करे याद किसी भी जानकारी को शब्दों और चित्र के माध्यम से याद रखने का प्रयास करें। चार्ट, संक्षिप्त रूप में याद रखना भी मददगार साबित होगा।

ये आदतें भी होंगी मददगार -कुछ अच्छी आदतें डालकर भी दिमाग को तेज रखा जा सकता है।

1। रोज व्यायाम करें नियमित व्यायाम से मस्तिष्क को ज्यादा आक्सीजन मिलती है जिससे याददाश्त कम होने का खतरा भी घट जाता है। साथ ही कुछ ऐसे रासायन स्रावित होते हैं जो दिमाग की कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाएंगे।

2. तनाव से बचें तनाव दिमाग को एकाग्रचित नहीं होने देता। ज्यादा तनाव से हार्मोन कोर्टिसाल दिमाग के हिप्पोकैंपस को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।

3. पूरी नींद लें अच्छी नींद लेने से दिमाग तरोताजा रहता है। नींद पूरी नहीं हो पाने से दिनभर थकावट रहती है और किसी काम में ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है।

4. धूम्रपान न करें सिगरेट पीने से मस्तिष्क तक आक्सीजन पहुंचाने वाली धमनियां सिकुडऩे लगती है जिससे दिमाग कमजोर होने लगता है।

क्या खाएं -फल, सब्जियों का पर्याप्त मात्रा में सेवन सेहत के साथ दिमाग के लिए भी काफी लाभकारी साबित होता है। विटामिन बी, बी 12, बी 6 फोलिक एसिड युक्त खाद्य पदार्थ जैसे पालक, हरी सब्जियां, स्ट्राबैरी, तरबूज-खरबूज जैसे रसीले फल, सोयाबीन से याददाश्त तेज होती है। ये नसों को क्षति पहुंचाने वाले होमोसिसटीन को नष्ट करते हैं। लाल रक्त कणिकाएं बनाने में मदद करते हैं जो मस्तिष्क तक आक्सीजन पहुंचाती हैं। टमाटर, ग्रीन टी, ब्रोकली और शकरकंद में विटामिन ई, सी और एंटीआक्सीडेंट पाए जाते हैं। ये शरीर और दिमाग में आक्सीजन का प्रवाह बढ़ाते हैं जिससे दिमाग की सक्रियता बढ़ती है। मछली, अखरोट और बादाम खाने से भी दिमाग तेज होता है।

शुक्रवार, मार्च 20, 2009

शायद कुछ हो ?

बुद्धिजीवी ब्लॉग वालों कि मस्त-मस्त बातों में मंदबुधिता की बातें करके माहौल बिगड़ना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं, फिर भी कुछ लोग तो है ही जिनके सामने अपनी बात रखी जा सकती है। बस इसी उम्मीद में बहुत दिनों से मन में दबा कर रखी ये बात शेयर करना चाहती हूँ। प्लीज बताइयेगा क्या ऐसा हो सकता है?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए विभिन्न अध्ययनों से यह स्पस्ट हो चुका है कि दुनियां में हर सौ लोगों के बीच तीन मानसिक विमंदित हैं। भारत में यह आंकड़ा 4 प्रतिशत तक माना जाता है। भारत में इन विमंदितों हेतु अनेक स्तरों पर शिक्षण, प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए कार्य किए जा रहे हैं। यह कार्य सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर संचालित हैं। विमंदितों की संख्या को देखते हुए यह कार्य और प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। यही कारण है कि सफलता और उपलब्धि का प्रतिशत संतोषजनक नहीं है। अगर यह माना जाए कि हम शत-प्रतिशत उपलब्धि पा सकते हैं, फिर भी हम इसे अपनी सफलता नहीं कह सकते, क्योंकि दूसरी ओर विमंदितों की संख्या अपनी निर्धारित दर से लगातार बढ़ रही है।

मेरी अवधारणा यह है कि जब हम मानसिक विकलांगता के अधिकांश कारणों से अवगत हैं तो क्यों न अपने संसाधनों और क्षमता का एक निश्चित भाग इसी के निवारण में लगाया जाए। अगर हम मानसिक विमंदिता की बरसों से स्थिर चली आ रही दर को कम कर सकें तो शिक्षण, प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए किए जा रहे कार्य का बोझ कम हो सकता है। यह भी संभव है कि एक दिन हम चेचक, मलेरिया और पोलियो की तरह इस समस्या पर भी पूरी तरह अंकुश लगाने में कामयाब हो जाएं और विमंदितों के पुनर्वास के कार्य की जरूरत ही न रहे।

उपयुक्त बातों को स्वीकार करते हुए समुदाय के सहयोग से गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य और पोषण संबंधी बेहतर देखभाल, फिर सुरक्षित प्रसव और बाद में शिशु की सुरक्षा से यह आसानी से संभव है। आसानी से इसलिए क्यों कि इस क्षेत्र में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में अनेक कार्यक्रम पहले से संचालित है। आवश्यकता है, उसमें बेहतर तालमेल बैठाना और मानसिक विमंदिता के मसले को प्रमुखता से नजर में रखना। माता के गर्भ में आकर प्राणवान होने के तत्काल बाद से ही भ्रूण को बिना किसी लिंग भेदभाव के सुरक्षित रूप से जीवित रहने, विकास और सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिल जाता है। ऐसे में उनकी शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की जरूरतों व अधिकारों के लिए यह सुरक्षा कार्यक्रम अपेक्षित है।

समाज में यह समझ विकसित होनी चाहिए कि बचपन से ही नहीं, गर्भकाल से सही विकास ही समूचे विकास का आधार है। गर्भकाल के जीवन का शुरूआती समय शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ओर पोषण के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, इस सुरक्षा कार्यक्रम का सर्वाधिक जोर इसी बात पर है। गर्भवती माता और उसकी कोख में पल रहा एक और जीवन कुपोषण, रुग्णता एवं इससे पैदा होने वाली विकलांगता और मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इस कार्यक्रम से उन्हें सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। यह सुरक्षा कार्यक्रम गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी बेहतर देखभाल और अंत में शिक्षा सेवाओं तक उनकी पहुंच बनाने का समन्वित नजरिया उपलब्ध करा सकता है। यह विशेष रूप से गरीब समुदाय की गर्भवती महिलाओं और बच्चों का स्वयं उन्हीं के वातावरण और अपने ही परिचित लोगों के बीच सर्वांगीण विकास का उपाय हो सकता है। इस कार्यक्रम के द्वारा कम आय वर्ग वाले साधन विहीन वर्ग तक सुविधाओं की उपलब्धता और समझ पहुंचाना प्रमुख लक्ष्य है।

मेरी मान्यता है कि प्रसव से पूर्व की बेहतर देखभाल व तैयारी, प्रसव के समय की सावधानियां व प्रसव के बाद की सुरक्षा से मानसिक विकलांगता की दर पर अंकुश लगाया जा सकता है।

बुधवार, मार्च 18, 2009

मंदबुद्धि बच्चों के शरीर में घातक यूरेनियम

उत्तर भारत के ज्यादातर मंदबुद्धि बच्चों के शरीर में घातक रेडियोएक्टिव तत्व यूरेनियम की मौजूदगी पाई गई है। यह चौंकाने वाली जानकारी जर्मनी की माइक्रो ट्रेस मिनरल लैबोरेटरी ने उत्तर भारत के मंदबुद्धि बच्चों के एक सर्वे के बाद जग जाहिर की है। इस जानकारी की सूचना भारत सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार अधिकार संरक्षण आयोग को भेज दी गई है।

हालाकिं हमारे देश में यूरेनियम का प्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल नहीं होता है, लेकिन ईरान, इराक, और अफगानिस्तान के सैन्य संघर्ष में 'डिप्लेटेड यूरेनियम' का उपयोग किया जाता है। यही 'डिप्लेटेड यूरेनियम' हवा और पानी के जरिए पाकिस्तान से लगी देश की उत्तरी सीमा से भारत में प्रवेश कर रहा है।
यह भी उल्लेखनीय है कि भारत की पश्चिमी सीमा से राजस्थान की सैंकड़ों किलोमीटर सरहद पाकिस्तान से लगी है। और राजस्थान में अभी इस तरह का कोई सर्वे नहीं हुआ है। (शुभदा)

सोमवार, मार्च 16, 2009

ज्यादा पानी नहीं पीना

प्रसव के दौरान अधिक मात्रा में पानी पीना शरीर के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है और इससे सिरदर्द, उल्टी और मस्तिष्क में सूजन जैसी तकलीफें आ सकती हैं। दक्षिण पूर्व स्वीडन के ‘केलमर काउंटी’ अस्पताल में 287 गर्भवती महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। अध्ययन में पता चला है कि प्रसव के दौरान ज्यादा पानी पीने से रक्त में सोडियम की मात्रा कम हो जाती है और इससे मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ सकता .

वर्ष 2007 में जनवरी से जून के बीच अस्पताल में भर्ती 287 महिलाओं को प्रसव के दौरान इच्छानुसार पानी पीने की अनुमति दी गई थी। प्रसव पूर्व और प्रसव बाद रक्त के नमूनों से पता चला कि अत्यधिक पानी पीने वाली महिलाओं के रक्त में सोडियम की मात्रा कम देखी गई।‘कार्नोलिस्का इंस्टीट्यूट’ में शरीर और औषधि विज्ञान विभाग के विबेकी मोइन ने कहा कि प्रसव के दौरान अत्यधिक पानी पीने से महिलाओं के रक्त में सोडियम की मात्रा प्रभावित होती है, जिसका मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

रविवार, फ़रवरी 22, 2009

इक्यावन फीसदी प्रसव भगवान भरोसे

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक देश की कम से कम 51 प्रतिशत महिलाओं पर गर्भावस्था और प्रसव के दौरान पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 3 की अंतिम रिपोर्ट के मुताबिक केवल 49 प्रतिशत महिलाएं किसी स्वास्थ्यकर्मी की देख-रेख में बच्चे को जन्म देती हैं। यह सर्वे स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कराया गया है।

सर्वे के मुताबिक 1999 की तुलना में स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति में प्रसव सम्पन्न कराने के प्रतिशत में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं के प्रसव को लेकर ग्रामीण और शहरी इलाकों में काफी अंतर पाया गया है। जहां शहरी इलाकों में 75 प्रतिशत महिलाएं प्रसव के दौरान चिकित्साकर्मी की सहायता लेती है, वहीं ग्रामीण इलाकों में केवल 39 प्रतिशत महिलाएं ही चिकित्साकर्मियों की उपस्थिति में बच्चे को जन्म देती हैं। अस्पताल में बच्चा पैदा होने की दर में 1999 के 34 प्रतिशत की तुलना में सात प्रतिशत की वृद्घि हुई है। 2006 में अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 41 था। लेकिन अभी भी अधिकतर महिलाएं अपने बच्चे को जन्म घर पर ही देती हैं। केवल एक-तिहाई महिलाएं प्रसव के दो दिन के भीतर जरूरी चीजें प्राप्त कर पाती हैं। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि भारत की गर्भवती महिलाओं की तीन-चौथाई से अधिक को कम से कम प्रसव से पहले कुछ जरूरी चीजें मिलती हैं, लेकिन इनमें से केवल आधी महिलाएं ही प्रसवपूर्व चिकित्सा केंद्र में तीन बार जाती हैं।