रविवार, फ़रवरी 22, 2009

इक्यावन फीसदी प्रसव भगवान भरोसे

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक देश की कम से कम 51 प्रतिशत महिलाओं पर गर्भावस्था और प्रसव के दौरान पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 3 की अंतिम रिपोर्ट के मुताबिक केवल 49 प्रतिशत महिलाएं किसी स्वास्थ्यकर्मी की देख-रेख में बच्चे को जन्म देती हैं। यह सर्वे स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कराया गया है।

सर्वे के मुताबिक 1999 की तुलना में स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति में प्रसव सम्पन्न कराने के प्रतिशत में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं के प्रसव को लेकर ग्रामीण और शहरी इलाकों में काफी अंतर पाया गया है। जहां शहरी इलाकों में 75 प्रतिशत महिलाएं प्रसव के दौरान चिकित्साकर्मी की सहायता लेती है, वहीं ग्रामीण इलाकों में केवल 39 प्रतिशत महिलाएं ही चिकित्साकर्मियों की उपस्थिति में बच्चे को जन्म देती हैं। अस्पताल में बच्चा पैदा होने की दर में 1999 के 34 प्रतिशत की तुलना में सात प्रतिशत की वृद्घि हुई है। 2006 में अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों का प्रतिशत 41 था। लेकिन अभी भी अधिकतर महिलाएं अपने बच्चे को जन्म घर पर ही देती हैं। केवल एक-तिहाई महिलाएं प्रसव के दो दिन के भीतर जरूरी चीजें प्राप्त कर पाती हैं। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि भारत की गर्भवती महिलाओं की तीन-चौथाई से अधिक को कम से कम प्रसव से पहले कुछ जरूरी चीजें मिलती हैं, लेकिन इनमें से केवल आधी महिलाएं ही प्रसवपूर्व चिकित्सा केंद्र में तीन बार जाती हैं।

शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरनाक एनीमिया

प्रकृति ने महिलाओं को कुछ इस तरह बनाया है कि वे प्रायः खून की कमी से जूझती हैं, खासकर वे महिलाएँ, जो माँ बनने के दौर में हैं। इससे महिलाओं की काम करने की क्षमता घट जाती है और वे जल्दी थक जाती हैं। रक्तक्षीणता रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती है। इस कारण वे रोगों से भी शीघ्र संक्रमित हो जाती हैं। एक जननी का स्वस्थ होना जरूरी है, क्योंकि उस पर एक नए जीवन को धरती पर लाने का जिम्मा है। रक्त प्रवाह हमारे शरीर की वह जीवनधारा है, जो सभी जरूरी पोषक पदार्थ लिए पूरे शरीर में चलती रहती है। यदि कोई स्त्री पहले ही आयरन की कमी झेल रही है तो उसका एनिमिया और अधिक हो जाएगा।

एनिमिया के बारे में थोड़ी जानकारी ले लेना आवश्यक है। हमारे रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में एक प्रोटीन होता है, जिसे हिमोग्लोबीन कहते हैं। हिमोग्लोबीन ऑक्सीजन का सप्लायर है, जो फेफड़ों से ऑक्सीजन उठाता है और सारे शरीर में पहुँचाता है। हिमोग्लोबीन बनाने के लिए आयरन चाहिए। यदि आपके शरीर में आयरन कम है तो हिमोग्लोबीन भी कम होगा। यही स्थिति एनिमिया कहलाती है। यदि महिला गर्भवती हो तो इम्यून सिस्टम कमजोर होने की वजह से जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। साल भर में एक औरत अपने कुल रक्त का 22 प्रतिशत खो देती है। ऐसे में जो औरतें अपनी खुराक में खून बनाने वाले पौष्टिक तत्वों को शामिल नहीं करतीं, उन्हें एनिमिया होने का अधिक खतरा रहता है। गौरतलब है कि भारत में पहले ही 80 प्रतिशत महिलाएँ एनिमिया की शिकार हैं। यह जनस्वास्थ्य संबंधी समस्या है, जो हर वर्ग में फैली है।

एक आम भारतीय शाकाहारी खुराक खून बनाने के लिए पर्याप्त पोषक पदार्थ नहीं दे पाती। कुछ पदार्थ होते हैं, जो आयरन को शरीर में अवशोषित होने से रोकते हैं- जैसे फाइटेट, जो कि साबुत गेहूँ के आटे व अन्य अनाजों में पाया जाता है या फिर कैफीन जो कॉफी, चाय, कोला में पाई जाती है। ये चीजें आयरन पर जम कर उसको शरीर में अवशोषित नहीं होने देतीं। जिन स्त्रियों में आयरन तथा अन्य पुष्टिकारी की कमी होती है, वे एनिमिया की शिकार बनती हैं। यह रक्त की असामान्य स्थिति है, जिसमें खून में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या बहुत घट जाती है। आयरन प्राप्त करने का सबसे बढ़िया माध्यम वे खाद्य पदार्थ हैं, जिनमें न केवल खूब आयरन होता है, बल्कि जो आयरन को शरीर में अवशोषित होने में भी सहायता करते हैं। शरीर ज्यादा से ज्यादा आयरन को अवशोषित कर पाए, इसके लिए आपको ऐसी खुराक लेना होगी, जिसमेंविटामिन सी और और बी-12 पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों। साथ में आयरनयुक्त खुराक लें। इसके लिए आपको संतुलित भोजन के अलावा ऐसे खाद्य या पेय पदार्थ लेने होंगे, जिसमें रक्त का निर्माण करने वाले सूक्ष्मरूप से पौष्टिक तत्वों के साथ हो। हों। ऐसी चीजों को आपपूरक आहार के तौर पर लें तभी आपको रक्त निर्माण करने वाली पौष्टिकता मिल पायेगी ।

एनीमिया के लक्षण

* चेहरा पीला पड़ जाना। * थकान महसूस होना। * व्यायाम के वक्त असामान्य तरीके से साँस की अवधि घट जाना। * दिल का तेजी से धड़कना। * हाथ-पाँव ठंडे हो जाना। * नाखूनों का नाजुक हो जाना। * सिरदर्द। * अक्सर एनिमिया के कोई लक्षण प्रकट नहीं भी होते।

सोमवार, फ़रवरी 02, 2009

पारम्परिक नमक भी प्राकृतिक आयोडीन से भरपूर !

गोवा की एक शोधकर्ता ने दावा किया है कि पारम्परिक रूप से उत्पादित नमक स्वास्थ्य के लिए अधिक फायदेमंद है।आयोडीन युक्त नमक को लेकर कई शोधकर्ता यह कहते रहे हैं कि प्राकृतिक रूप से उत्पादित नमक में आयोडीन समान मात्रा में नहीं पाया जाता है, लेकिन गोवा विश्वविद्यालय की सविता केरकर इससे असहमत हैं।सविता ने कहा, “मैं गोवा में पिछले तीन वर्षों से पारम्परिक रूप बनाए जा रहे नमक पर अध्ययन कर चुकी हूं।” मैंने राज्य में नमक के 150 नमक की खदानों से नमूनों का संग्रह कर प्रयोगशाला में इनका परीक्षण किया। पारम्परिक नमक भी समान रूप से प्राकृतिक आयोडीन से भरपूर होता है।”प्राकृतिक नमक स्वास्थ्य के लिए जरूरी खनिज तत्वों से भरपूर है जबकि शोधित नमक में इन तत्वों की मात्रा बहुत कम पाई जाती है।केरकर का अध्ययन गोवा में पारम्परिक रूप से उत्पादित नमक तक ही सीमित है, लेकिन उनका मानना है कि भारत के अन्य हिस्सों के प्राकृतिक नमक में भी यह स्वास्थ्यवर्धक तत्व मौजूद हैं। भारत प्रति वर्ष लगभग एक करोड़ टन नमक का उत्पादन करता है जिसमें गुजरात का सर्वाधिक योगदान है। अन्य प्रमुख नमक उत्पादक राज्यों में तमिलनाडु एवं राजस्थान शामिल हैं।

रविवार, फ़रवरी 01, 2009

एक दाना बदल सकता है आपकी जिंदगी

सुश्री सारदा लहांगीर की ओर से यह सुखद जानकारी मिली की उड़ीसा के कोरापुट जिले के एक छोटे से गांव पदमपुर में आदिवासी महिलाएं एक सराहनीय कार्य कर रही हैं। दरअसल यह अशिक्षित महिलाएं अपने आसपास के गांवों में जाकर आयोडीन नमक बेच रही हैं। भले ही यह आदिवासी महिलाएं अशिक्षित हैं, लेकिन स्वास्थ्य के प्रति इनकी जागरूकता देखने लायक है।
आयोडीन नमक को लेकर इन महिलाओं के द्वारा उठाए जा रहे इनके कदम सचमुच काबिले तारीफ हैं।काफी दिनों तक इस इलाके के लोगों लिए आयोडीन नमक कोई महत्व नहीं रखता था, लेकिन जब आयोडीन के महत्व को लेकर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, तब जाकर इन आदिवासी महिलाओं को आयोडीन के महत्व का पता चला। गांव की स्वयं सहायता समूह की एक बैठक में इन महिलाओं को जानकारी दी। इनको बताया गया कि माताओं के लिए आयोडीन नमक कितना आवश्यक है।गांव की 50 वर्षीया आदिवासी महिला पार्वती नायक का बेटा मानसिक रूप से विमंदित है। उसे इस बैठक के बाद पता चला कि आयोडीन नमक कितना आवश्यक है। इसके बाद से नायक ने इस नमक के बारे में घर-घर जाकर जानकारी दी। वह बताती है कि आयोडीन नमक का एक दाना आपकी जिंदगी बदल सकता है।उसने आगे बताया कि अगर उसे यह पहले पता होता, तो आज उसका बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं होता। पार्वती एक अभियान के तौर पर यह काम कर रही है। गांव की स्वयं सहायता समूह की यह आदिवासी महिलाएं अब घर-घर जाकर लोगों को आयोडीन नमक उपलब्ध करा रही हैं।

मंगलवार, जनवरी 27, 2009

हमारी विमंदिता का कारण...आयोडीन की कमी

मानसिक विमंदिता का एक प्रमुख कारण गर्भावस्था के दौरान उपयोग किए गए नमक में आयोडीन की कमी होना होता है बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आयोडीन युक्त नमक का सेवन दिखाने के बावजूद हमारे देश में करोड़ों लोगों में आयोडीन की कमी है। देश में करीब सात करोड़ दस लाख लोग आयोडीन की कमी से होने वाले विकारों से पीड़ित हैं। यह जानकारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की ओर से लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी जा चुकी है। जानकारी में बताया गया कि देश में कोई भी राज्य आयोडीन की कमी से होने वाले विकारों से मुक्त नहीं है। इससे निपटने के लिए सरकार आयोडीन युक्त नमक के सेवन को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए हुए है। सरकारी बयान के अनुसार 2008-09 में देश में आयोडीन युक्त नमक का उत्पादन लक्ष्य 52 लाख टन रखा गया है।
हमारे देश को आजादी हुए साठ वर्ष हो चुके हैं। इसके बावजूद पूरे देश में 70 लाख से अधिक बच्चे आयोडीन की कमी से पैदा होने वाली बीमारी से ग्रस्त हैं। देश के अधिकांश इलाके में यह समस्या देखी जा सकती है। सरकार ने आयोडीनयुक्त नमक के इस्तेमाल को जरूरी कर दिया है लेकिन देश के दूरदराज वाले कई इलाकों में साधारण नमक का अभी भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।
अपने अनुभवों को बांटते हुए "शुभदा" यह बताना चाहेगी कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के पड़होना गांव जाने का मौका मिला। इस दौरान पता चला कि एक ही परिवार के 17 बच्चे आयोडीन की कमी के शिकार हैं।

बुधवार, जनवरी 21, 2009

निःशक्त भ्रूण को जन्म दें? या नहीं....

सुनीता अरोड़ा भी शायद एक और निकिता मेहता बन जाती जिन्हें अपने 24 हफ्ते के भ्रूण का गर्भपात कराना था। उनके डॉक्टर ने अंदेशा लगा लिया था कि उनका बच्चा कुछ जटिलताओं के साथ पैदा होगा, लेकिन जब सुनीता गर्भपात करवाने पहुंची तो तो उन्हें बताया गया कि 20 हफ्ते से ज्यादा होने पर गर्भपात गैरकानूनी है।जब उनका बच्चा अमन पैदा हुआ तो उनका डर सच में बदल गया। उनके बच्चे को ‘थैलेसीमिया मेजर’ (गंभीर रक्त की बीमारी जिसमें चोट लगने पर रक्त का बहाव रुकता नहीं)।

इसका मतलब यह कि हर महीने उन्हें 10,000 रुपए अमन के रक्त आधान और दवाओं पर खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन इतना भारी खर्च उठाना इस मध्यम वर्गीय महिला की क्षमता में नहीं है। सात साल बाद आज भी सुनिता अमन को जन्म देने पर पछताती हैं। सुनीता कहती हैं कि, “मैं बच्चे को गिराना चाहती थी, लेकिन उन्होंने कहा कि अब काफी देर हो चुकी है, इसलिए मेरे पति और मैंने बच्चे को जन्म देने का निर्णय लिया। इससे भी बुरा हमने उसे किसी और के गोद में देने का विचार किया। काश हमें यह बच्चा न होता”। क्या सुनीता को प्रकृति के विरुद्ध चले जाना था? क्या इसी में मां और बच्चा दोनों की भलाई छिपी थी? लेकिन जब मुम्बई की एक गृहिणी निकिता मेहता और उनके पति ने अजन्मे बीमार बच्चे को गिराना चाहा तो यह विवाद छिड़ गया। आश्चर्यचकित तौर पर महिलाओं ने निकिता का पक्ष लिया और उनका मत है कि एक मां को अपने बच्च को जन्म देने या नहीं देने का पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन आज कई माताएं ऐसी स्थिति में हैं जिस स्थिति में कभी निकिता भी होती अगर उसने एक गंभीर हृदय बीमारी से ग्रस्त बच्चे को जन्म दिया।

तस्वीर का दूसरा पहलू

जीनत का बच्चा शफी आम बच्चों की तरह नहीं हैं क्योंकि उसके दिल में भी एक छेद है। दो शल्यचिकित्सा के बाद भी उसे ठीक होने में अभी काफी वक्त लगेगा। लेकिन अगर जीनत को अपने बच्चे की बीमारी का पहले ही पता लग जाता, तो क्या वो अपने अजन्मे बच्चे को गिरा देती? इस पर जीनत कहती हैं कि, “नहीं, वह मेरे लिए वरदान है। मैं उसे उसी रूप में पसंद करती हूं जिस रूप में भगवान ने मुझे दिया है। किसी की जिंदगी लेने का अधिकार हमें नहीं है”। हृदय के विकार से ग्रस्त एक बच्चे के पिता रफीक किदवई का कहना है कि, “हमें प्रकृति के खिलाफ नहीं जाना चाहिए। यह नियमों और जिंदगी के खिलाफ है। इस तरह हम और हमारे बच्चे जिंदगी की मुश्किलों से लड़ने में सक्षम हो पाएंगे”। निकिता मेहता का नाम इतिहस में दर्ज हो जाएगा क्योंकि वो एक ऐसी मां के रूप में जानी जाएगी जिसने अपने बीमार अजन्मे बच्चे का गर्भपात कराने के लिए भारतीय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया। भले ही न्यायालय ने उन्हें इस बात की इजाजत नहीं दी, लेकिन प्रकृति उनके साथ थी और निकिता का अपने आप ही गर्भपात हो गया। प्रकृति के खिलाफ जाना चाहिए कि नहीं, इसका कोई निश्चित जवाब भले ही नहीं मिले, लेकिन निकिता, सुनिता या जीनत जैसे माताओं की बात सुनें तो शायद सही जवाब मिल जाए।

(निलान्जला बोस की बदोलत)

सोमवार, जनवरी 05, 2009

क्या हमने समझने की कोशिश की ?

(शिक्षकों के लिए विशेष)
आपको किसी स्कूल की कक्षा में या कक्षा के बाहर कुछ ऐसे बच्चे मिले होंगे जिनकी जरूरतें कुछ विशेष प्रकार की होती हैं अर्थात बच्चों के सीखने तथा काम करने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। कुछ बच्चे बहुत जल्दी और सरलता से सीखते है, जबकि कुछ बच्चे देर में तथा अधिक प्रयत्न करने पर सीख पाते हैं। कक्षा में कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनको खाने में कठिनाई होती है। सीखने के लिए उन्हें आपसे कुछ अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती है। कभी-कभी हम उनकी समस्याएं समझ पाते हैं, कभी-कभी नहीं समझ पाते। हमारी विशेष मदद के बावजूद अनेक समस्याएं बनी रहती है।
ये बच्चे कौन है? तथा इनकी अतिरिक्त आवश्यकताएं क्या है? यदि आप इन समस्याओं की प्रकृति और बच्चों की आवश्यकताओं को समझेंगे तो उनकी ठीक से मदद कर सकेंगे। चलिए ! हम उन बच्चों को सीखने की समस्याओं को तथा यह जानने का प्रयास करें कि हम उनकी कैसे मदद कर सकते है। हो सकता है कुछ बच्चों में अन्धापन, बहरापन, मानसिक पिछड़ापन जैसी गम्भीर अक्षमताएं हो अथवा इनसे सम्बन्धित दृष्टि श्रवण, वाणी, मानसिक मंदता एवं अधिगम अक्षमता जैसे दोष हों।हो सकता है ऐसे बच्चे आपके नजर में न हो, यह भी हो सकता है उनके माता-पिता हमसे सम्पर्क करने में भी हिचकिचाएं, हो सकता है उनको इसलिए भर्ती न किया हो कि वे माता-पिता की दृष्टि में विद्यालय में पढ़ने के योग्य नहीं है। या हम उनकी मदद नहीं कर सकते हैं।

परन्तु यह सच है कि यदि उन्हें कुछ समय पहले ही विद्यालय में भर्ती किया गया होता और उनकी समस्याओं को समझकर सहायता दी गयी होती तो उनमें से बहुत से बच्चे सामान्य बच्चों की तरह सीख रहे होते या उनकी समस्या गम्भीर होने से रोकी जा सकती थी। यदि उनमें से कुछ बच्चों को विशिष्ट विद्यालयों में भेजा गया होता तो वहां उन्हें विशेष सुविधायें उपलब्ध हो जाती । विद्यालय अपनी कक्षाओं में तथा कक्षाओं के बाहर विशेष प्रकार से प्रोत्साहित करके कई प्रकार के विकलांगों की सहायता कर सकते हैं। अब तक हमने उनकी संवेदनशीलता सीखने सम्बन्धी समस्याओं को समझने की कोशिश ही नहीं की। हो सकता है इन बच्चों की सीखने सम्बन्धी समस्याओं के कुछ खास कारण रहे हों लेकिन फिर भी हमनें उन्हें लापरवाह, असावधान, मन्दबुद्धि अथवा कोई ऐसा नाम दिया हो जिससे समस्या और अधिक बिगड़ी हो।

कुछ लोगों का मानना है कि सभी प्रकार की विकलांगता वाले बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष प्रकार की तकनीकों को आवश्यकता पड़ती है जो हमेशा सच नहीं है। रोजमर्रा की कक्षा में पढ़ाने वाले अध्यापकों को इन बच्चों को पढ़ाने के लिए विशेष तकनीक की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योंकि विशेष प्रकार की तकनीक की आवश्यकता उन विकलांग बच्चों को सिखाने के लिए पड़ती है जिनका रोग असाध्य या कठिन रूप धारण कर चुका है। साधारण रूप से विकलांग बच्चों की शिक्षा में विशेष तकनीक की नहीं वरन् शिक्षक के अनुकूल दृष्टिकोण के विकास की अधिक आवश्यकता होती है।बच्चों की अधिक समस्याओं का जन्म अनेक कारणों से होता है जिनमें कुछ कारण बच्चों के अन्दर निहित होते हैं, कुछ अन्य वातावरण से सम्बन्धित होते है। बच्चों की अधिगम समस्याओं से सम्बन्धित आन्तरिक कारण निम्नवत् हो सकते है।
बौद्धिक क्रियाकलाप का निम्नस्तर तथा विकास की मन्दगति।
दृष्टि विषयक समस्या (देखने में कठिनाई)।
श्रवण तथा वाक समस्या (सुनने तथा बोलने में कठिनाई)
हाथ-पैर का क्षतिग्रस्त होना या हाथ-पैर का न होना, अंगों की विकृति, मांसपेशियों के तालमेल में समस्या होने सेक्रियाकलाप में कठिनाई।
मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं जैसे प्रत्यक्षीकरण, अवधान, स्मृति विषयक समस्याए ।
दृष्टि तथा मांसपेशियों में तालमेल न होने से पढ़ने-लिखने, वर्ण विन्यास में कठिनाई।
माता-पिता के स्नेह में कमी।
परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बच्चों को दूसरे बच्चों की भांति समान स्तर पर स्वीकार न किया जाना अर्थात बच्चों को हीनभावना से देखना।
सीखने के समान अवसर न मिलना तथा बातचीत करने के कम अवसर मिलना।
शिशु स्तर पर लालन-पालन के अनुपयुक्त तरीके अपनाना।
शिक्षक का बच्चे से कम लगाव होना।
सीखने की गति धीमी होने पर बच्चे के प्रति गलत धारणा बना लेना।
कक्षा में अनुकूल सामाजिक वातावरण न होना।
सामान्य बच्चों का विकलांग बच्चे के साथ प्रतिकूल व्यवहार करना।
उत्तरदायित्व निर्वहन तथा सुविधाओं की भागीदारी जैसी भावनाओं के प्रति उदासीनता होना।
बच्चों की विशिष्ट आवश्यकताओं तथा भौतिक सुविधाओं के सामंजस्य का अभाव होना।
प्राथमिक स्तर पर काम करने वाले अध्यापक यह समझ लें कि इन बच्चों की अपंगता का क्या स्वरूप है तथा किस हद तक अपंगता है, तभी वे प्राप्त जानकारी के अनुसार अन्हें शिक्षा देने के दायित्व का यथोचित रूप से निर्वहन करने के लिए तैयार हो सकेंगे। सामान्य विद्यालयों के अध्यापकों में इन बच्चों की शिक्षा संबंधी विशेष प्रकार की जरूरतों को समझने की आवश्यकता है जिससे उनकी आवश्यकता के अनुरूप अनुकूल शिक्षा को नियोजित कर सकें। इसका उत्तरदायित्व सबसे अधिक कक्षा के अध्यापकों पर आता है क्योंकि उनका इन बच्चों से सीधा सम्पर्क होता है तथा उन्हें बच्चों को ध्यान से देखने का अवसर भी मिलता ।

(प्राइमरी के मास्टर प्रवीण त्रिवेदी से साभार)

रविवार, दिसंबर 28, 2008

विकलांग बच्चे को ट्राई साइकिल देने का वायदा पूरा किया

सचिन नए साल की छुट्टियाँ मसूरी में बिता रहें है। वे अपने वायदे के पक्के हैं। पिछली बार मसूरी पहुंचे मास्टर ब्लास्टर ने एक विकलांग बच्चे को ट्राई साइकिल देने का वायदा किया था और इस बार उन्होंने वायदा निभाया। इन दिनों सचिन जमकर वादियों का लुत्फ उठा रहें हैं। उन्होंने अपने प्रशंसकों को भी मायूस नहीं किया और उनसे खूब बातें कीं।
नया साल मनाने मसूरी पहुंचे लिटिल मास्टर सचिन ने एक पूरा दिन बच्चों के साथ बिताया और आटोग्राफ दिए। सचिन को लेकर बच्चों में इस हद तक उत्साह था कि कागज न मिलने पर उन्होंने पत्थर पर ही आटोग्राफ ले लिए। सचिन रोजाना की तरह पत्‍ि‌न अंजलि, दोस्त संजय नारंग, क्रिकेटर समीर दिघे समेत अपने दोस्तों के साथ मार्निग वॉक पर निकले। सुबह के समय लाल टिब्बा से सचिन ने नागाधिराज हिमालय के दर्शन किए। सचिन ने लाल टिब्बा में चहलकदमी की और प्रशसंकों से जमकर बातचीत की।

सुबह से ही वाइन वर्ग ऐलन, सेंट जार्ज व अन्य स्कूलों के बच्चे भारी तादाद में चार दुकान में सचिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। सचिन ने फुर्सत से बच्चों की जिज्ञासा शांत की और जमकर आटोग्राफ दिए। एक बच्चे के पास कागज न होने पर पत्थर पर ही अपने आटोग्राफ दिए। उत्सुकता का आलम यह था कि कई बच्चे शाम तक भी चार दुकान में डटे रहे। सचिन ने लंढौर कैंट में संचालित एक स्वयंसेवी संस्था में रह रहे कोल्टी गांव के एक विकलांग बच्चे गुड्डू को ट्राई-साइकिल गिफ्ट की। सचिन के इस मानवीय चेहरे ने लोगों को अभिभूत कर दिया। सचिन जब पिछली बार मसूरी आए थे, तब उन्होंने गुड्डू को ट्राई-साइकिल देने का वायदा किया था, और उन्होंने आज साबित कर दिया कि वे अपने वादे के पक्के हैं। सचिन के हाथों ट्राई-साइकिल गिफ्ट मिलने से गुड्डू बेहद प्रफुल्लित हैं। दोपहर में सचिन वुडस्टॉक स्कूल सचिन नए साल तक मसूरी प्रवास पर रहेंगे। हालांकि सचिन ने अपने प्रवास के बारे में स्वयं कुछ नहीं बताया।

शुक्रवार, दिसंबर 26, 2008

नि:शक्तों के लिए महत्वाकांक्षी योजना

स्वपरायणता, प्रमस्तिकघात, मानसिक मंदता एवं बहु विकलांगता के क्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय न्यास द्वारा ज्ञान प्रभा योजना, उद्यम नि:शक्त कल्याण के क्षेत्र में कार्य कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से आवेदन पत्र आमंत्रित किए गए हैं। ज्ञान प्रथा योजना के तहत यदि इन श्रेणियों के नि:शक्त, विद्यालयीय शिक्षा के बाद मान्यता प्राप्त संस्थान से स्वरोजगार रोजगार के लिए व्यावसायिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण लेते हैं। तो उन्हें सात सौ रुपए मासिक छात्रवृत्ति देय होगी। ऐसे नि:शक्त अभ्यर्थी के परिवार की मासिक आय 15 हजार रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए।

उद्यम प्रभा योजना बी पी एल परिवार के नि:शक्त, जिनकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक है, के आर्थिक विकास और स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई है। इन चार श्रेणियों के नि:शक्तों के लिए एक लाख तक के ऋण पर 5 प्रतिशत प्रोत्साहन राशि तथा अन्य श्रेणियों के नि:शक्तों के लिए 3 प्रतिशत प्रोत्साहन राशि 5 वर्ष तक के लिए देय होगी। चयन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर होगा। निरामया स्वास्थ्य बीमा योजना इन श्रेणियों के नि:शक्तों के लिए महत्वाकांक्षी योजना है।

यह योजना 15 हजार रुपए तक की वार्षिक आय वाले नि:शक्तों के लिए नि:शुल्क तथा इससे अधिक आय वालों के लिए दो सौ पचास रुपए तक का नि:शुल्क बीमा किए जाने का प्रावधान है। बीमित व्यक्ति को स्वास्थ्य कार्ड जारी किया जाएगा, जिसके आधार पर वह देश के किसी भी अस्पताल में इलाज कराकर चिकित्सा व्यय के पुनर्भरण हेतु पात्र होगा।

गुरुवार, दिसंबर 11, 2008

वो क्या जाने फटी बिवाई॥

पुनः सोचा था "प्र" को "प" लिखा जाए तो अंगहीनता का अहसास हो सकेगा। लेकिन........

जाके पाँव ना फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।
और
जाके होय ना पाँव गोसाई, वो क्या जाने फटी बिवाई॥

मंगलवार, दिसंबर 09, 2008

चलो पतिज्ञा करें

चलो पतिज्ञा करें , कि पेम का पसार पारंभ करते हुए समाज के पति शतपतिशत योगदान देकर इस देश के सुधार कार्यक्रमों का पमुख हिस्सा बनने का पयास करें और निः शक्त बेसहारों को सहारा पदान करें !
इति शुभदा

गुरुवार, दिसंबर 04, 2008

बस दस वोट......पर हक़ तो मिला.

आज राजस्थान में ३.६२ करोड़ मतदाताओं में से करीब ६८ प्रतिशत ने मतदान किया। इनमे शुभदा की नजर में आए कम से कम १० वोट ऐसे लोगो के भी हैं, जिन्होंने विमंदित होने के बावजूद अपने वोट के हक़ हांसिल किए। इन विमंदितों के अभिभावकों को अब तक यही पता था कि मंद बुद्धि होने के कारण वे अच्छे या बुरे का विचार करने को आत्मनिर्भर नही हैं। मतदान के लिए अन्य पर निर्भर होने के कारण पहले चुनाव में कुछ मतदान कर्मचारिओं ने इन्हे वोट नहीं डालने दिया था। तब से ये बच्चे (?) १८ साल कि फिजिकल एज होने के बाद भी मताधिकार से वंचित थे।
इस बार भी मतदान वाले दिन कि शुरुआत पहले कि तरह ही हुई थी, लेकिन सुबह से घर में बैठे विमंदित मतदाताओं के लिए कुछ जिद्दी और जुझारू लोगों द्वारा किए गए प्रयासों के बाद दोपहर तक माहौल बदल चुका था।
परिस्थितियां वही पहले के चुनाव जैसी की मतदान के लिए अन्य की सलाह या निर्देश पर निर्भर होने के कारण इन्हे वोट नहीं डालने दिया जा सकता। यह समस्या भी उठाने कर्ण प्रयास हुआ की इन्हें जब किसी मेडिकल बोर्ड ने ही विमंदित या मंदबुद्धि माना है और इसका प्रमाण पत्र भी इनके पास है। प्रमाणपत्र में इनकी आईक्यू भी दर्ज है। ये मतदाता किसी के कहने पर वोट दे रहा है। ऐसे में उसे वोट नही देने दिया जा सकता। मतदान केन्द्र में मौजूद कुछ बुद्धिजीवियों ने भी अपने दिमाग पर जोर देने के बाद मतदान कर्मचारिओं की बात को सही माना और वक्त बर्बाद नहीं करने की सलाह भी दी। इनसे विमंदितों के पक्षधर जिद्दिओं को अलग से जूझना पड़ा।
मामला मतदान कर्मचारिओं से पीठासीन अधिकारी और फ़िर चुनाव पर्वेक्षकों तक पहुँची और पूरा मसला इस एक बात पर हल हो गया की अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूचि में है तो उसे मतदान करने से नही रोका जा सकता फ़िर चाहे उसकी सोच या विचार की क्षमता का स्तर कुछ भी हो।
फ़िर शाम तक विभिन्न केन्द्रों में ऐसे कम से कम दस लोगों ने पूरे अधिकार के साथ वोट डाले। आगामी चुनाव से पहले उन लोगों के नाम भी मतदाता सूची में दर्ज होंगे जो अब तक मतदान से वंचित थे ।
शेष शुभ
"शुभदा"