शनिवार, अप्रैल 24, 2010

ज्वैलरी बना के चमके 'तारे'

'शुभदा' में प्रशिक्षित मानसिक विमंदित युवाओं ने कर दिखाया


70 दिन में सीखी ज्वैलरी बनाने की कला और पाई इसके व्यवसाय की जानकारी

मानसिक विमंदितों के लिए 'शुभदा' द्वारा चलाए गए ज्वैलरी मैकिंग के एक प्रशिक्षण शिविर में 10 मानसिक विमंदित युवाओं ने 15 अपै्रल को अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया। इसी के साथ इस बात पर फिर मोहर लग गई कि अगर मानसिक विमंदितों को उचित तरीके से प्रशिक्षण दिया जाए तो वे वास्तव में अपनी आजीविका कमाने में सक्षम हो सकते हैं।

इस प्रशिक्षण आयोजन के समन्वयक अपूर्व ने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 16 जनवरी 10 को शुरू किया गया था। इसके लिए प्रशिक्षकों और फिजीओथैरेपिस्टों द्वारा विमंदित युवाओं के लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया। क्षेत्रीय पार्षद श्रीमती मंजू सुराणा की मौजूदगी में आरम्भ हुए इस प्रशिक्षण में प्रथम चरण के लिए 10 युवाओं को चुना गया था। इसमें मेल-फीमेल दोनों को शामिल किया गया था। शुरू में यह कार्य काफी कठिन प्रतीत हो रहा था, लेकिन असंभव नहीं।

आखिर में प्रशिक्षकों और प्रशिक्षु युवाओं ने इसे संभव कर दिखाया। प्रशिक्षण के समापन अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में ज्वैलरी व्यवसायियों, जन प्रतिनिधियों और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच प्रशिक्षु युवाओं ने आगंतुकों के समक्ष तरह तरह की ज्वैलरी का निर्माण करके दिखाया। इसके बाद युवाओं को हाथों-हाथ उनके उत्पादों के लिए आर्डर भी मिले। इन युवाओं के लिए बैंक में खाते खुलवा कर व्यवसाय को व्यस्थित किए जाने के प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रमुख समाजसेवी श्रीमती किरण शारदा ने इन युवाओं के लिए स्वयं सहायता समूह गठित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया। क्षेत्रीय पार्षद श्रीमती मंजू सुराणा के अनुसार ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की मानसिक विमंदित युवाओं के पुनर्वास के लिए महत्ती आवश्यकता है।

इस प्रशिक्षण से रूबरू हुए पूर्व विधायक नरेन साहनी, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी।आर।पंडत, अजमेर के प्रतिष्ठित शेयर व्यवसायी कपिल कर्नावट, महिन्द्रा के प्रतिनिधि भगवत प्रसाद राठी, कला अंकुर संस्था की अध्यक्षा श्रीमती स्नेहलता शर्मा और सचिव श्रीमती माधवी स्टीफन सहित अनेक गणमान्य लोगों ने मानसिक विमंदित युवाओं के इस प्रयास को सराहा। इन लोगों ने प्रशिक्षुओं को आजीविका योग्य संबल प्रदान करने का आश्वासन भी दिया।

प्रमुख प्रशिक्षक श्रीमती सुप्रभा कविराज ने प्रशिक्षण की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत किया और आगामी बैच के लिए की गई तैयारियों की जानकारी दी। विशेष प्रशिक्षक श्रीमती सरोज और फिजीयोथैरेपिस्ट डा। प्रदीप शर्मा ने बताया कि विमंदित युवाओं के लिए तैयार किया गया यह पाठ्यक्रम सफल रहा है। इसमें समय-समय पर प्रशिक्षुओं की जरूरतों के मुताबिक और सुधार किए जाने के द्वार खुले हैं।

'मूमल' का सपोर्ट

कला और शिल्प जगत में प्रतिष्ठित 'मूमल' संस्थान ने विमंदितों की आजीविका और पुनर्वास के लिए 'शुभदा' की ओर से किए जा रहे प्रयासों में सक्रीय भागीदारी का करार किया है। इसके तहत मूमल की ओर से आजीविका कौशल विकसित करने के विभिन्न कार्यक्रमों में तकनीकि सहयोग प्रदान किया जाएगा। इसके साथ ही प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ फैकेल्टी के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे। यह सभी प्रशिक्षक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पी होंगे

बुधवार, मार्च 31, 2010

केन्द्र बोले पेंशन, राज्य देवे टेंशन

आहत करे राहत

विमंदित और बधिरों को विकलांग मानने या न मानने पर विवाद

राजस्थान में मानसिक विमंदित और बधिरों को विकलांग मानने या न मानने पर विवाद हो गया है। विवाद के चलते जहां करीब 30 हजार लोगों की पेंशन रोक दी गई है, वहीं करीब ढाई लाख लोगों के विकलांगता के प्रमाण पत्रों के बेकार हो जाने का खतरा हो गया है।

सरकार ने नि:शक्तजनों की पेंन्शन का दायरा बढ़ाकर दृष्टिहीनों और चलन नि:शक्ततों के साथ अन्य नि:शक्तजनों को भी इसमें शामिल तो कर लिया, लेकिन उम्र का ऐसा भेद कर दिया कि उनके लिए नई परेशानी खड़ी हो गई। यही नहीं, उनके लिए बीपीएल होने की अनिवार्यता भी जोड़ दी है जिससे सैकड़ों लोगों को पेन्शन से वंचित ही रहना पडेगा।

केन्द्रीय नि:शक्तजन अधिनियम-1995 में मानसिक विमंदितों और बधिरों को नि:शक्तजन की श्रेणी में रखा गया है, वहीं राज्य के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने इन दोनो श्रेणियों को गैर नि:शक्त कहते हुए सरकारी फायदे देने से इन्कार कर दिया है। विभाग की लेखा शाखा ने उन सभी मानसिक विमंदितों व श्रवण बाधितों की करीब एक साल पूर्व इस आधार पर पेंशन रोक दी कि ये नियमानुसार सहीं नहीं है और ये दोनो श्रेणियां इसकी हकदार नहीं है।

विवाद होने पर पिछले साल राजस्थान सरकार ने नि:शक्तों से सम्बन्धित मसलों पर उच्च स्तरीय कमेटी गठित की है। कमेटी के विभाग के प्रमुख शासन सचिव के साथ ही चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, मेडिकल शिक्षा और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को शामिल किया गया है। अब तक यह कमेटी यह स्पष्ट नहीं कर सकी है कि दोनो श्रेणियां विकलांगता की श्रेणी में आते है या नहीं? वहीं इस मुद्दे को लेकर नि:शक्तजन क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि कई बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिल चुके है, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

जिस कानून के तहत नि:शक्तजनों को पेन्शन का सहारा दिया जा रहा है, उसका नाम तो नि:शक्तजन समान अवसर अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी है, लेकिन असलियम में हो कुछ और ही रहा है। 15 जनवरी से पहले तक राज्य में केवल दृष्टिहीन व चलन नि:शक्तों को ही पेंन्शन मिल रही थी। इसके बाद से मानसिक विमंदित, बधिर, कमजोर दृष्टि, कुष्ठ रोग मुक्त नि:शक्तों व मानसिक रूग्णता से पीडि़तों को भी पेन्शन का लाभ दे दिया गया है। लेकिन शर्त जोड़ दी कि पेंशन के लिए उनका 18 वर्ष की आयु पार होने के साथ ही बीपीएल होना अनिवार्य कर दिया गया। जबकि दूष्टिहीन व चलन नि:शक्तों के मामले में न्यूनतम उम्र 8 वर्ष है उम्र के साथ ही बीपीएल होने की अनिवार्यता कर दी गई, जिससे सैकड़ों नि:शक्तजन आवेदन से ही वंचित हो गए है ऐसे में नि:शक्तों का कहना है कि नई बीपीएल सूची बनने में अभी वक्त लगेगा, तब तक ये क्या बिना पेन्शन के ही बैठै रहेंगे?

गुरुवार, मार्च 18, 2010

.....तब तो यह आपके लिए नहीं।

क्या आप कभी किसी मानसिक विकलांग बच्चे से रूबरू हुए हैं?...... अगर सोशल मीडिया के ब्लॉगरों की दुनियां में आप केवल मनोरंजन के साधन ही खोजते हैं तो यह नीरस ब्लॉग आपके लिए कतई नहीं है। यह कड़वा सच है कि अधिकांश के लिए यह माध्यम मनोरंजन का साधन ही है, तो कुछ के लिए अपनी भड़ास निकाल कर आत्ममुग्ध होने का साधन। मुझे लगा कि मनोरंजन के साथ कुछ सामाजिक सरोकार भी होते हैं। इसके जरिए कुछ सामाजिक समस्याओं की ओर ध्यान खींच कर उनके निदान ढूंढ़े जा सकते हैं। लेकिन मेरा यह विचार एक हद तक ख्याली पुलाव ही साबित हुआ।
यही कारण रहा कि मैं हताश होकर लगातार कई-कई दिनों तक ब्लॉग की इस दुनियां से लापता रही। ब्लॉगर भाई-बंधु गर्भावस्था के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां पढ़ते समय भी मनोरंजन या कौतुक की तलाश में ही नजर आए। इस संबध में लिखे आधा दर्जन से अधिक लेखों में केवल उसी एक लेख को पाठक मिले जिसमें गर्भावस्था के दौरान सैक्स के संबंध में चर्चा की गई। ऐसे में मेरा साहस भी जवाब दे गया और नतीजतन आपकी इस दुनियां से दूरियां बढ़ती गई। जाहिर है आप यह सवाल कर सकते हैं कि '...तो फिर अब क्या लेने आई हो?Ó
जवाव यही है कि मुझे लगा सभी तो एक जैसे नहीं होंगे, कभी तो कोई ऐसे नीरस विषय के लिए भी उत्साहमय वातावरण बनाने को आगे आएगा। कोई तो होगा जो इस मसले पर ऐसे विकलांग ब्लॉग के लिए केवल 'हाय बेचाराÓ बोल कर अगला ब्लॉग तलाशने के लिए आगे बढऩे के बजाय ठिठककर इनकी बात सुनेगा। वास्तव में ऐसे विशेष बच्चे ज्यादा संतुलित व्यवहार का हक रखते हैं, ताकि वे विकलांगता में अपनी जिन्दगी जी सकें।
आम तौर पर एक विकलांग अपने आप में कई विकलांगों का एक समूह होता हैं। सच तो यह है कि विकलांगता केवल विकलांग ही नहीं भोगता। एक सदस्य घर में विकलांग क्या हुआ, सारा परिवार ही विकलांग हो जाता है। पूरा परिवार अपने दुर्भाग्य पर रोता है। बहुत से लोग इस पर अपना व्यवहार भी सामान्य नहीं रख पाते। वे या तो इनकी उपेक्षा करने लगते हैं या फिर ज्यादा लाड़-दुलार कर अन्जाने ही उन्हें भावनात्मक रूप से अधिक लाचार बना जाते हैं। जबकि उन्हें सामान्य और संतुलित व्यवहार की अधिक दरकार होती है।
तो मित्रों नव संवत्सर पर एक बार फिर नई उम्मीदों के साथ आपके बीच आपके बीच यह नीरस विषय लेकर उपस्थित हूं। तुलसीदास जी कह है न - 'धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी।Ó
इति आपकी 'शुभदाÓ

शनिवार, मई 23, 2009

सबको देखना चाहिए

किसी बहुत भारी काम का बीडा उठाने के बाद, कभी - कभी जब हिम्मत हारने को होती है और कोई सहारा नजर नही आता, तभी अचानक कुछ ऐसा सामने आ जाता है की टूट कर जमीन पर पड़ी हिम्मत को भी पंख मिल जाते है। ऐसा ही इन दिनों मेरे साथ भी हुआ, लेकिन ये विडियो देखने के बाद.......... अब मै फिर जुटी हूँ और आपके बीच उपस्तिथ हूँ। आप भी देखें.......

शनिवार, मई 02, 2009

जैसी मां वैसा ही बच्चा

जैसी मां वैसा ही बच्चा की कहावत को एक अनुसंधान ने सही साबित कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन किया और पाया कि जिन महिलाओं का गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान सामान्य से अधिक वजन रहा है उनके बच्चे भी सामान्य से अधिक वजनी या अधिक खाने वाले होते है।

अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान माता के खान-पान का असर बच्चे के दिमाग, उसके हाव भाव और शारीरिक ऊर्जा की खपत को प्रभावित करता है।शोधकर्ताओं ने पाया कि अत्यधिक वसायुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाली महिलाएं सामान्य से अधिक मोटी होती हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि ऐसी महिलाओं को अधिक खाना खाने या गर्भावस्था के दौरान दो व्यक्तियों के लिए अधिक भोजन करने वाली बात कहने से पहले दोबारा सोचना चाहिए। समाचार पत्र डेली टेलीग्राफ ने इस शोध के हवाले से कहा है कि इस तरह के बच्चों में किशोरावस्था के दौरान ही मधुमेह के लक्षण प्रतीत होने लगते हैं।

गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

....और 12 साल की उम्र में बना दिया 'मॉं'

अभी एक ब्लॉग पर अन्दर तक हिला देने वाली ख़बर पढ़ी। फुटपाथ पर कचरा बीनने वाली एक बिन मां की बच्ची को किसी ने मां बना दिया। न बच्ची को और न ही उसके पिता को इसका पता चला, जब बच्ची को पेट में दर्द हुआ और फुटपाथ पर ही एक बच्चे का जन्म हो गया, तब समाज की वो तस्वीर सामने आई जो बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर रही है। पूरी सचित्र ख़बर के लिए आप उस ब्लॉग तक ख़ुद जाएँ यही बेहतर होगा। ब्लॉग का पता है http://oursocialaudit.blogspot.com/

ज्यादा उम्र में भी मां बनना अब आसान

करियर की महत्वाकांक्षा पूरी करने और मां बनने में से एक विकल्प चुनने के लिए मजबूर महिलाओं के लिए खुशखबरी है। अब उम्रदराज होने पर भी महिलाओं के मां बनने की सम्भावना बढ़ गई है। नए वैज्ञानिक शोध के अनुसार मानव जाति के विकास की प्रक्रिया में पूर्वजों के मुकाबले अब 30 से 50 वर्ष की उम्र में प्रजनन सम्बन्धी बीमारियों से सुरक्षा ज्यादा मजबूत हो गई है। ब्रिटिश अखबार डेली टेलीग्राफ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले पांच हजार वर्षों में मानवजाति में पिछले किसी भी काल के मुकाबले आश्चर्यजनक रूप से 100 प्रतिशत से ज्यादा तेजी से विकास हुआ है। इस विकास की बदौलत ऐसे गुणसूत्रों का विकास हुआ है जिनमें बीमारी से लडऩे की क्षमता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। इससे महिलाओं की ज्यादा उम्र में भी मां बनना सम्भव है और प्रजनन क्षमता ज्यादा उम्र तक बरकरार रह सकती है।

शोधकर्ता प्रोफेसर जॉन हॉक्स के अनुसार मानव विकास की सतत प्रक्रिया के दबाव के कारण मोटापा, हृदय सम्बन्धी बीमारी, मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रसित होने की सम्भावना कम हो गई है। इन बीमारियां के कारण उम्रदराज होने के बाद प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन इन बीमारियों से सुरक्षा होने के कारण उम्रदराज होने पर भी प्रजनन क्षमता बनी रहेगी।

ज्यादा उम्र में भी मां बनना भले ही संभव हो लेकिन इसमें भी कुछ मामलों में दिक्कत हो सकती है, मसलन अधिक उम्र वाली मां की संतान अधिक वजन वाली हो सकती है,उनके बच्चे भी सामान्य से अधिक वजनी या अधिक खाने वाले हो सकते हैं। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

बुधवार, अप्रैल 29, 2009

बेटे को जन्म देने के बाद अपेक्षाकृत अधिक तनाव


यूं तो आपने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए मन्नत मांगते हुए कई लोगों को देखा होगा, लेकिन फ्रांसीसी वैज्ञानिकों की मानें तो बेटे को जन्म देने के बाद माताएं अपेक्षाकृत अधिक तनाव में रहने लगती हैं।यही नहीं कुछ माताओं की तो जीवनशैली ही निम्न स्तर की हो जाती है। हाल ही में 'नैंसी विश्वविद्यालय' के शोधकर्ता क्लाड डी टॉयची के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने 191 माताओं पर एक अध्ययन किया था। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं को ज्ञात हुआ कि पुत्रों को जन्म देने वाली 10 में से सात महिलाएं लड़कियों को जन्म देने वाली महिलाओं की अपेक्षाएं अधिक तनाव में रहती हैं और प्रसव के बाद उनकी जीवनशैली भी काफी बदल जाती है।

'बीबीसी' के ऑनलाइन संस्करण पर जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययन के दौरान 17 महिलाओं में से अधिक तनाव में रहने वाली 13 महिलाएं ऐसी थी, जिन्होंने बेटों को जन्म दिया था, जबकि केवल चार ऐसी महिलाएं थी जो कि बेटियों के जन्म के बाद तनावपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही थी।हालांकि, वैज्ञानिक फिलहाल महिलाओं के बीच पाए जाने वाले इस अंतर के कारणों का पता नहीं लगा सके हैं। शोधकर्ता टायची कहते हैं कि, 'इस अध्ययन से उस तथ्य को बल मिलता है जिसके अंतर्गत कहा जाता है कि भ्रूण का लिंग, माताओं की जीवनशैली की गिरावट प्रसवोपरांत तनाव बढ़ाने का अहम कारक होता है।

इस शोध को सही माने तो अधिक उम्रदराज महिलाएं अधिक तनाव में रहती हैं, ऐसे में अगर अधिक उम्र में गर्भधारण होने पर पुत्र प्राप्ति के अवसर अधिक हो सकते हैं? जो भी हो अधिक उम्र में मां बनने के अवसर आज पहले की अपेक्षा कहीं अधिक हैं। इस पर चर्चा होगी कल। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

पुत्र पैदा नहीं कर पाती प्रदूषण झेलने वाली महिलाएं


विशेष प्रकार का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलने वाली महिलाएं लड़के को जन्म नहीं दे सकतीं। सान फ्रांसिस्को में गर्भवती महिलाओं पर किए गए एक शोध से यह बात निकलकर सामने आई है। विज्ञान समाचार पत्र 'साइंसडेली' में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं 'पॉलीक्लोरिनेटेड बाईफिनाइल्स' (पीसीबी) का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलती हैं, उनमें लड़कों को जन्म देने की क्षमता काफी कम हो जाती है।

गौरतलब है कि पीसीबी पर 1950 और 1960 के दशक में प्रतिबंध लगा दिया गया था। पीसीबी कारखानों में बिजली उपकरणों कूलिंग (शीतलक) के तौर पर उपयोग में लाए जाते हैं। इनका उपयोग वॉरनिश और चाक बनाने में भी होता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पीसीबी बच्चों में लिंग अनुपात को प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं पीसीबी का उच्चस्तरीय प्रदूषण झेलती हैं, उनमें लड़कों को जन्म देने की क्षमता 33 फीसदी कम हो जाती है।

लेकिन, पुत्र का मतलब सब कुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं होता, बेटे को जन्म देने के बाद माताएं अपेक्षाकृत अधिक तनाव में रहने लगती हैं। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

गर्भावस्था में संगीत से शान्ति


क्या गर्भावस्था का संगीत से कोई रिश्ता हो सकता है? हाल ही में किए गए एक शोध में इस प्रश्न का जवाब 'हां' में दिया गया है। ताईवान के कोहसिउंग चिकित्सा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में गर्भवती महिलाओं को दो समूहों में बांटा। उनमें से 116 को गीत-संगीत वाली सीडी और 120 को सामान्य देखभाल मुहैया कराई गई। इस शोध के अंर्तगत, पहले समूह की महिलाओं को चार-चार सीडी दी गई। पहली सीडी में लुलाबीज के रॉक गीत थे तो दूसरी में बीथोवेन और डेबस्सी का शास्त्रीय संगीत। तीसरी सीडी में कुछ प्राकृतिक ध्वनियां थीं और चौथी में चीन की नर्सरी राइम्स और कुछ गीत शामिल थे।

अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं ने लुल्लाबीज, बीथोवेन और प्राकृतिक ध्वनियों वाली सीडी सुनीं उन्होंने अन्य महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक शांति महसूस की।अध्ययन का नेतृत्व कर रहे शोधकर्ता चुंग-हे चेन ने बताया कि, 'गर्भावस्था का संगीत सगीत सुनने वाली गर्भवती महिलाओं ने अन्य महिलाओं की तुलना में खुद पर दबाव कम महसूस किया।

संगीत से केवल शांति ही नहीं कुछ खास स्थितियों में नर या मादा भ्रूण की भूमिका भी तय होती है। हालांकि हम जानते हैं कि भूण के नर या मादा होने की प्रक्रिया गर्भधारण के समय प्राकृतिक रूप से तय होती है। फिर भी पुत्र या पुत्री जन्म होने के लिए कुछ कारण काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं, कल से इस मसले पर कुछ चर्चा हो सकती है, अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

रविवार, अप्रैल 26, 2009

अत्यधिक व्यायाम करने से भी समस्या

अपने एक नए शोध में शोधकर्ताओं ने कहा है कि गर्भावस्था के दौरान कम से कम व्यायाम करने चाहिए। अत्यधिक व्यायाम करने से काफी समस्या आ सकती है। गौरतलब है कि गर्भावस्था के दौरान व्यायाम करना आवश्यक माना जाता है, लेकिन अत्यधिक व्यायाम खतरनाक साबित हो सकता है। अपने इस नए शोध में शोधकर्ताओं ने कहा है कि महिलाओं को प्रतिदिन गर्भावस्था के दौरान व्यायाम करना चाहिए, लेकिन उतना ही व्यायाम करना चाहिए जितना कि आवश्यक है।

शोधकर्ताओं ने लगभग 90 हजार गर्भवती महिलाओं का साक्षात्कार लिया। इस साक्षात्कार में इन लोगों ने व्यायाम को लेकर अलग-अलग सवाल पूछे। साक्षात्कार में उन महिलाओं को भी शामिल किया गया जो गर्भावस्था के दौरान व्यायाम नहीं करती हैं। इसके साथ ही वैसी गर्भवती महिलाओं से भी बात की गई जो सप्ताह में सात घंटे तक व्यायाम करती हैं। जो महिलाएं सात घंटे से ज्यादा समय व्यायाम और खेल आदि में बिताती हैं, उन्हें गर्भावस्था को लेकर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि इस प्रकार ज्यादा व्यायाम या खेल में समय बिताने से गर्भवती महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि गर्भावस्था के दौरान तैराकी ज्यादा फायदेमंद है। इससे कोई समस्या नहीं आती है। गौरतलब है कि गर्भवती महिलाओं के बीच तैराकी काफी लोकप्रिय माना जाता है। सरकारी विभाग ने भी गर्भवती महिलाओं से इस संबंध में सलाह देते हुए कहा है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक व्यायाम से इन्हें बचना चाहिए। उन्हें उतना ही व्यायाम करना चाहिए जितना कि उनके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

व्यायाम के साथ ही और भी बहुत कुछ है जो गर्भकाल में सहायक होता है। एक स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए संगीत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कल इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या गर्भावस्था का संगीत से कोई रिश्ता हो सकता है? अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....-इति आपकी 'शुभदा'

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

गर्भावस्था में व्यायाम से स्वस्थ बच्चा

गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं नियमित व्यायाम करती हैं वो हमेशा स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे के दौरान यह बात सामने आई।कैनसास सिटी यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन के दौरान यह खुलासा किया कि गर्भावस्था में नियमित व्यायाम करने से गर्भ में पल रहा बच्चा भी स्वस्थ पैदा होता है। इतना ही नहीं इससे बच्चे के फेफड़े और तंत्रिका तंत्र भी मजबूत बनते हैं। इसके साथ ही गर्भ में पल रहे बच्चे को सांस लेने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं होगी अगर मां स्वस्थ रहती है।
अनुसंधानकर्ता लिंडा कहती हैं कि व्यायाम गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ही शुरू कर देना चाहिए इससे बच्चे स्वस्थ और मजबूत होंगे उनका तंत्रिका तंत्र मजबूत होगा और उनके अचानक मरने के दुष्प्रभाव कम हो जाएंगे। यह शोध 20 से 35 वर्ष से ज्यादा उम्र की महिलाओं पर किया गया जिनमें से आधी महिलाओं ने जिन्होंने लगातार चलना, साइकिल चलाना और हफ्ते में तीन बार आधे घंटे के लिए दौडऩा जैसे व्यायाम किए जबकि बाकी की महिलाओं ने कुछ भी नहीं किया। परिणाम के तौर पर जिन महिलाओं ने नियमित व्यायाम किया उन्होंने बाकी महिलाओं की अपेक्षा स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
अति तो हर चीज की वर्जित है, जहां शोधकर्ताओं ने नियमित व्यायाम पर जोर दिया है वहीं यह भी कहा है कि अत्यधिक व्यायाम करने से काफी समस्या आ सकती है। अधिक विवरण के लिए कल इसी ब्लाग पर, ठीक इसी समय फिर मिलेंगे, अभी इजाजत दें। शेष शुभ....
-इति आपकी 'शुभदा'