मंगलवार, अप्रैल 28, 2015
Successs story of RASHU'S MOM
गुरुवार, मई 08, 2014
नि:शक्जनों की दशा-दिशा पर कार्यशाला
शुक्रवार, दिसंबर 27, 2013
मंगलवार, अप्रैल 02, 2013
Autism ऑटिज्म क्या है?
ऑटिज्म
ऑटिज्म एक मानसिक विकार है. हिन्दी में ऑटिज्म को 'आत्मविमोह' या 'आत्मकेन्द्रन' कह सकते हैं। जिसके लक्षण जन्म से या बाल्यावस्था से ही नज़र आने लगते है। जिन बच्चो में यह रोग होता है उनका विकास अन्य बच्चो से असामान्य होता है ।
ऑटिज्म को कैसे पहचाने?
बाल्यावस्था में सामान्य बच्चो एवं ऑटिस्टिक बच्चो में कुछ प्रमुख अन्तर होते है जिनके आधार पर इस अवस्था की पहचान की जा सकती है जैसे:-
1.सामान्य बच्चें माँ का चेहरा देखते है और उसके हाव-भाव समझने की कोशिश करते है परन्तु ऑटिज्म से ग्रसित बच्चे किसी से नज़र मिलाने से कतराते है।
3।सामान्य बच्चे रे-धीरे भाषा ज्ञान में वृद्धि करते है परन्तु ऑटिस्टिक बच्चे बोलने के कुछ समय बाद अचानक ही बोलना बंद कर देते है तथा अजीब आवाजें निकलतें है।
5.ऑटिस्टिक बच्चे तकलीफ के प्रति कोई क्रिया नही करते और बचने की भी कोशिश नही करते।
8.ऑटिस्टिक बच्चे अन्य बच्चों की तरह काल्पनिक खेल नही खेल पाते वह खेलने के वजाय खिलौनों को सूंघते या चाटते है।
10.ऑटिस्टिक बच्चे बहुत चंचल या बहुत सुस्त होते है।
11.इन बच्चो में कुछ विशेष बातें होती है जैसे एक इन्द्री का अतितीव्र होना जैसे: श्रवण शक्ति।
ऑटिज्म होने के क्या कारण है?
ऑटिज्म होने के किसी एक वजह को नही खोजी जा सकी है। अनुशोधो के अनुसार ऑटिज्म होने के कई कारण हो सकते है जैसे:
1.मस्तिष्क की गतिविधियों में असामान्यता होना।
2.मस्तिष्क के रसायनों में असामान्यता होना।
3.जन्म से पहले बच्चे का विकास सामान्य रूप से न हो पाना।
ऑटिज्म का क्या इलाज़ है?
ऑटिज्म की शीघ्र की गई पहचान, मनोरोग विशेषज्ञ से तुंरत परामर्श ही इसका सबसे पहला इलाज़ है।
ऑटिज्म से ग्रसित बच्चो को निम्नलिखित तरीको से मदद की जा सकती है?
बुधवार, अक्टूबर 10, 2012
मन कुनका मौला अली है...
डिवाइन अबोड संस्था की ओर से यहां चल रहे आठ दिवसीय इंटरनेशनल सूफी फेस्टिवल के तहत 10 अक्टूबर की शाम आठवें दिन के आयोजन में यह कार्यक्रम रखा गया था। सहायक जिला कलक्टर मौहम्मद हनीफ के मुख्य आथित्य में हुए कार्यक्रम में संस्था डिवाइन अबोड की प्रधान गुलशा बेगम ने शुभदा संस्था के विमंदित बच्चों से दर्शकों को रूबरू कराया और उन्हें प्रस्तुति देने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया। प्रस्तुति से पूर्व इस प्रमुख प्रक्रिया के लिए शुभदा संस्था के समन्वयक अपूर्व सेन के साथ विशेष विद्यालय के प्रशिक्षित शिक्षक भी सक्रिय थे।
इन विशेष शिक्षकों ने इस प्रस्तुति के लिए 18 बच्चों के साथ लगभग 15 दिन तक परिश्रम किया था। उल्लेखनीय है कि प्रस्तुति के पूर्वाभ्यास में शामिल सभी बच्चे कार्यक्रम के मंच पर भी मौजूद थे, ऐसा सामान्यतया नहीं होता है। इस अवसर पर इन बच्चों के अभिभावक भी मौजूद थे जो अपने बच्चों द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम से स्वयं भी रोमांचित थे।
सोमवार, अक्टूबर 08, 2012
तीन दिन तक कांटों में पड़ी रही नवजात
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| भंवरी की गोद में बच्ची |
तुझे सब पता है न माँ ...
तेज बुखार, घाव भरा बदन और आंखों में इंफेक्शन। ऑक्सीजन की कमी से नीला पड़ा शरीर। रोना तो भूल गई, बस कराह रही थी। यह सिहरन दौड़ाने वाला दर्द आठ महीने की नवजात ने तीन दिन तक कांटों में झेला... पता नहीं कैसे?शुभदा नेटवर्क। झुंझुनूं के गांव ढिगाल की रोही में कैर की झाडिय़ों के बीच फेंकी गई इस बेटी की कराह को बगल से गुजर रहे गांव के जगदीश व निवास ने सुनी। इन्होंने 108 एंबुलेंस को इत्तला दी। फिर बमुश्किल कंटीले कैर की झाडिय़ों से निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया। अब यह बेटी बीडीके अस्पताल में जिंदगी के लिए जद्दोजहद कर रही है।
हाव भाव से लग रहा है मां की गोद में जाने की तड़प लगी है। तभी तो ढिगाल गांव की भंवरी ने जब उसे छाती से लगाया तो बच्ची ने पलकें झपकाई। मानो कह रही हो, मुझे यह दर्द क्यों दिया गया? खेत से घास लेकर जा रही भंवरी ने भीड़ देखी और पता चला कि कांटों में मासूम पड़ी है तो वहीं ठहर गई थी। भंवरी ने घास की भरोटी वहीं गिरा दी और मासूम को गोद में ले लिया। पड़ोस से मांगे कपड़े में उसे लपेटा। 108 इमरजेंसी एबुलेंस में बैठकर झुंझुनूं तक अस्पताल में आई।
भंवरी ने सिर्फ इतना कहा कि वह एक मां है और उसे गर्व है कि नवजात को अस्पताल जिंदा लेकर पहुंची है। इलाज शुरू होने और भर्ती करने के बाद ही भंवरी को चैन आया। बच्ची का इलाज एफबीएनसी वार्ड में चल रहा है। सूचना मिलने पर मुकुंदगढ़ थानाधिकारी मौके पर पहुंचे और जांच शुरू की है।
2-3 दिन से पड़ी थी बच्ची : डॉक्टर
बीडीके अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. बीडी बाजिया ने बताया कि बच्ची का वजन 2.1 किलो है। सांस लेने में थोड़ी दिक्कत है। आंखों में इंफेक्शन के अलावा उसे बुखार है। हाथ-पांव की चमड़ी छिली है। ऑक्सीजन की कमी से हाथ-पांव नीले पड़ गए हैं। इससे लगता है कि शिशु को 2-3 दिन पहले डाला गया है। वह गर्भ में करीब 8 महीने रही है। नाल देखकर लगता है कि डिलीवरी प्रशिक्षित स्टाफ ने कराई है। इसे नवजात गहन शिशु चिकित्सा इकाई में रेडियंट हिट वार्मर ओवरहेड पर रखा गया है।
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रविवार, अक्टूबर 07, 2012
करोड़ों खर्च, लेकिन एक भी स्कूल नहीं
विमंदित बच्चों के अभिभावक मायूस
प्रवेश को बाध्य
आरटीई के नियमों में नि:शक्त बच्चों को भी असुविधा ग्रस्त माना गया है। यानी स्कूल उन्हें कानूनन नि:शुल्क प्रवेश देने को बाध्य हैं। यहां तक कि प्रमुख सचिव (शिक्षा) ने भी आदेश दे रखा है कि ऐसे बच्चों के आने पर हर हाल में उन्हें प्रवेश दें। चाहे वे सरकारी स्कूल हों या निजी।
पूरे राज्य में एक स्कूल नहीं
प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में नि:शक्त विद्यार्थियों के लिए विभिन्न श्रेणियों के सात विशेष विद्यालय खुले हैं। यह अंधता, मूक बघिर, दृष्ट्रि बाघित एवं नि:शक्तता की अन्य श्रेणियों वाले बच्चों के लिए ही हैं, लेकिन मानसिक विमंदितों के लिए एक भी स्कूल नहीं है।
शनिवार, अक्टूबर 06, 2012
घायल को लेकर उल्टी दिशा में क्यों दौड़ती है '108' एंबुलेंस
निजी अस्पताल में क्यों ले जाते हैं ?
राजस्थान में जयपुर के शिवपुरी एक्सटेंशन कॉलोनी निवासी सीए छात्र पीयूष शर्मा (20) का 26 अप्रैल को कालवाड़ रोड (पंखा कांटा) के पास एक्सीडेंट हुआ। किसी राहगीर की सूचना पर 108 एंबुलेंस आई। एंबुलेंस घायल छात्र को शहर की ओर आने के बजाय करीब 10 किलोमीटर दूर हाथौज स्थित एक निजी अस्पताल लेकर पहुंच गई।तड़पते बेटे का दर्द
अस्पताल वालों की ओर से मरीज के पैर का ऑपरेशन करने की बात कही। तब तक दुर्घटनाग्रस्त छात्र के पिता अस्पताल पहुंच चुके थे। पीयूष बार-बार कहता रहा कि उसके सीने में भयानक दर्द हो रहा है। वहां इलाज की माकूल व्यवस्थाएं नहीं थी, पिता से तड़पते बेटे का दर्द देखा नहीं गया। उन्होंने दुबारा 108 एंबुलेंस को फोन कर बुलाया तो वही एंबुलेंस आ गई। इस पर पिता आरपी शर्मा बेटे को लेकर एसएमएस की ओर रवाना हुए, लेकिन बीच रास्ते में ही पीयूष की मौत हो गई।
जानकर दंग रह गए
बेटे की मौत में गमजदा शर्मा तब कुछ नहीं कर पाए। बाद में उन्होंने पीयूष के एक्सीडेंट होने से करीब दस किलोमीटर विपरीत दिशा में जाने के घटनाक्रम का पता लगा तो वे यह जानकर दंग रह गए कि एंबुलेंस घायल को वहां लेकर ही कैसे गई। दरअसल अव्वल तो इतनी ही दूरी पर शहर की ओर एसएमएस अस्पताल था। वहीं इस अस्पताल के बजाय रास्ते में तीन से पांच किलोमीटर की दूरी पर खंडाका, चौहान, दीप, सोनी अस्पताल थे। आरोप है कि मौजूदा अस्पताल से यहां इलाज के बेहतर विकल्प मौजूद हैं।
एंबुलेंस सेवा सवालों के कठघरे में
इस घटनाक्रम से आपातकालीन 108 एंबुलेंस सेवा सवालों के कठघरे में है। सवाल लाजिमी है कि क्या 108 एंबुलेंस में कार्यरत स्टाफ को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर वहां ले जाने के पीछे उनका कोई निहित स्वार्थ था? इस बारे में मृतक पीयूष के पिता ने कई बार 108 के अफसरों से जानकारी चाही, जिसका उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
निजी अस्पताल लेकर जाते हैं
उधर स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने स्पष्ट कहा कि अव्वल तो घायल मरीजों को सरकारी अस्पताल में ही ले जाना चाहिए, वहीं अगर निजी अस्पताल लेकर जाते हैं तो इसके लिए मरीज के परिजनों की सहमति जरूरी है। हालांकि इस मामले में घायल को बड़े निजी अस्पताल ले जाने के बजाय इनकी अपेक्षा कमतर स्वास्थ्य सेवाओं वाले निजी फ्रैक्चर अस्पताल में ही ले जाया गया।
शनिवार, सितंबर 29, 2012
'बर्फी' बेहद स्वादिष्ट है
इससे पहले तारे जमीं पर.... और उससे भी पहले ब्लैक, मैं ऐसा ही हूं, आइ एम खांन जैसी कई फिल्मों ने लोगों का ध्यान डिसेबिलिटी और उसे भोग रहे लागों की दुनियां की ओर खींचा है।
बर्फी (रणबीर कपूर) और झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) साधारण इंसान भी नहीं हैं क्योंकि उनमें शारीरिक और मानसिक विकलांगता है। श्रुति (इलियाना डीसूजा) में कोई कमी नहीं है। इन तीनों के इर्द-गिर्द जो कहानी गढ़ी गई है वो भी साधारण है। दरअसल किरदार पहले सोच लिए गए और फिर कहानी लिखी गई, लेकिन बर्फी को देखने लायक बनाता है अनुराग बसु् का निर्देशन, सभी कलाकारों की एक्टिंग और सशक्त किरदार।
कहानी कहने की अनुराग की अपनी शैली है। उनकी फिल्मों में कहानी अलग-अलग स्तर पर साथ चलती रहती है जिसे वे आपस में लाजवाब तरीके से गूंथ देते हैं। बर्फी में भी उन्होंने इसी शैली को अपनाया है।
फिल्म में 1972, 1978 और वर्तमान का समय दिखाया गया है। सभी दौर की कहानी साथ चलती रहती है, जिसे कई लोग सुनाते रहते हैं। इस वजह से यह फिल्म देखते समय दिमाग सिनेमाघर में साथ रखना पड़ता है।
दार्जिलिंग में रहने वाला बर्फी एक ड्राइवर का बेटा है और उसे सम्पन्न परिवार की श्रुति (इलियाना) चाहती है, जिसकी सगाई किसी और से हो चुकी है। श्रुति यह बात अपनी मां (रूपा गांगुली) को बताती है। मां द्वारा अपनी बेटी को समझाने वाला जो दृश्य बेहतरीन है।
श्रुति को उसकी मां ऐसी जगह ले जाती है जहां कुछ लोग लकड़ी काटते रहते हैं। उसमें से एक की ओर इशारा कर मां कहती है कि जवानी में वे उसे चाहती थी, लेकिन यदि उसके साथ शादी करती तो ऐशो-आराम और सुविधा भरी जिंदगी नहीं जी पाती।
इस तरह के कई शानदार दृश्य फिल्म में हैं, जिसमें क्लाइमेक्स वाले दृश्य का उल्लेख जरूरी है। अनाथालय में झिलमिल को ढूंढते हुए बर्फी आता है, लेकिन वो उसे नहीं मिलती। जब वह श्रुति के साथ वापस जा रहा होता है तब पीछे से झिलमिल उसे आवाज लगाती है, लेकिन सुनने में असमर्थ बर्फी को पता ही नहीं चलता कि उसकी पीठ पीछे क्या हो रहा है।
श्रुति यह बात अच्छे से जानती है कि यदि बर्फी को झिलमिल का पता लग गया तो वह बर्फी को खो देगी। यहां पर श्रुति की प्रेम की परीक्षा है कि वह स्वार्थी बन चुप रहेगी या उसके लिए अपने प्रेमी की खुशी ही असली प्यार है और वह बर्फी को यह बात बता देगी। फिल्म की कहानी से थोड़ी छूट लेकर यह सीन लिखा गया है, लेकिन ये फिल्म का सबसे उम्दा सीन है।
फिल्म के पात्र आधे-अधूरे हैं, लेकिन इससे फिल्म बोझिल नहीं होती। साथ ही उनके प्रति किसी तरह की हमदर्दी या दया उपजाने की कोशिश नहीं की गई है। फिल्म में कई-कई छोटे-छोटे दृश्य हैं, जिनमें हास्य होने के साथ-साथ यह बताने की कोशिश की गई है कि बर्फी को अपनी कमियों के बावजूद किसी किस्म की शिकायत नहीं है और वह जीने का पूरा आनंद लेता है। विमंदित झिलमिल का कैरेक्टर स्टोरी में जगह बनाने में काफी समय लेता है।
रणबीर कपूर ने बहुत जल्दी एक ऐसे एक्टर के रूप में पहचान बना ली है। संवाद के बिना अभिनय करना आसान नहीं है, लेकिन रणबीर ने न केवल इस चैलेंज को स्वीकारा बल्कि सफल भी रहे। बर्फी की मासूमियत, मस्ती और बेफिक्री को उन्होंने लाजवाब तरीके से परदे पर पेश किया है। श्रुति के घर अपना रिश्ता ले जाने वाले सीन में उनकी एक्टिंग देखने लायक है।
कमर्शियल और मीनिंगफुल सिनेमा में संतुलन बनाए रखना प्रियंका चोपड़ा अच्छे से जानती हैं। जहां एक ओर वे 'अग्निपथÓ करती हैं तो दूसरी ओर उनके पास 'बर्फीÓ के लिए भी समय है। ग्लैमर से दूर एक मंदबुद्धि...( सॉरी विमंदित कहिए ना!) लड़की का रोल निभाकर उन्होंने साहस का परिचय दिया है। कुछ दृश्यों में तो पहचानना मुश्किल हो जाता है कि ये प्रियंका है। प्रियंका की एक्टिंग भी सराहनीय है, लेकिन उनके किरदार को कहानी में ज्यादा महत्व नहीं मिल पाया है।
रणबीर और प्रियंका जैसे कलाकारों की उपस्थिति के बावजूद इलियाना डिक्रूज अपना ध्यान खींचने में सफल हैं। उनका रोल कठिन होने के साथ-साथ कई रंग लिए हुए है, और इलियाना ने कोई भी रंग फीका नहीं होने दिया है। एक पुलिस ऑफिसर के रूप में सौरभ शुक्ला टिपिकल बंगाली लगे हैं। उनके साथ सभी कलाकारों ने अपने-अपने रोल बखूबी निभाए हैं।
रवि वर्मन ने दार्जिलिंग और कोलकाता को खूब फिल्माया है और सभी कलाकारों के चेहरे के भावों को कैमरे की नजर से पकड़ा है। फिल्म के गीत अर्थपूर्ण हैं, लेकिन उनकी धुनें ऐसी नहीं है कि तुरंत पसंद आ जाएं।
बुधवार, अप्रैल 04, 2012
विकलांग लड़की की पत्थर से शादी!
इस वैज्ञानिक युग में भी समाज को अंधविश्वास की जकड़न से छुटकारा नहीं मिल पाया है. समाज को झकझोर देने वाला अंधविश्वास का नया मामला उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जनपद के एक गांव का है, जहां एक पिता अपनी विकलांग बेटी की शादी पत्थर से तय कर निमंत्रण पत्र भी बांट चुका है.
शादी की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और गांव के देवी मंदिर में इसके लिए अनुष्ठान भी शुरू हो चुका है.
फतेहपुर जिले के जाफरगंज थाने के परसादपुर गांव की गौरा देवी मंदिर में यज्ञ और कर्मयोगी श्रीकृष्ण की रासलीला का मंचन किया जा रहा है. इसी यज्ञ के पंडाल में एक अप्रैल को गांव के बालगोविंद त्रिपाठी
मानसिक एवं शारीरिक रूप से अक्षम अपनी बेटी की शादी मंदिर के एक पत्थर के साथ हिंदू रीति-रिवाज से रचाएंगे.
इसके लिए उन्होंने बाकायदा निमंत्रण पत्र छपवा कर इलाके के गणमान्य व अपने रिश्तेदारों में वितरित भी कराया है. अचरज भरी बात यह है कि निमंत्रण पत्रों में सभी वैवाहिक कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के लखनऊ सचिवालय में तैनात एक कर्मचारी राजेश शुक्ल द्वारा सम्पन्न कराए जाने का उल्लेख है.
त्रिपाठी का कहना है कि वह अपनी बेटी की शादी मंदिर के पत्थर के साथ इसलिए करने जा रहे हैं, ताकि वह अगले जन्म में विकलांग पैदा न हो. ग्रामीण जगन्नाथ का कहना है कि पत्थर के साथ शादी रचाने की
यह पहली घटना है. कुछ दिन पूर्व भी त्रिपाठी ने ऐसी कोशिश की थी लेकिन गांव वालों के दबाव में वह सफल नहीं हो पाए थे. मकसद में कामयाब होने के लिए ही अबकी बार उन्होंने सचिवालय के कर्मचारी को आगे किया है, ताकि पुलिस कार्रवाई न हो सके.
बिंदकी के उप-प्रभागीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) डॉ. विपिन कुमार मिश्र ने बताया, 'मुझे इसके बारे में जानकारी मिली है और मैंने जाफरगंज थानाध्यक्ष को कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.'
जाफरगंज के पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) सूर्यकांत त्रिपाठी ने बताया, 'यह समाज का फैसला है, इसके लिए क्या कहा जाए. पत्थर से शादी हो सकती है या नहीं, यह जिले के अधिकारी बताएंगे.'
थानाध्यक्ष जाफरगंज मनोज पाठक ने कहा, 'एसडीएम का निर्देश मिल चुका है, गांव जाकर जांच पड़ताल की जाएगी. बेजान या पशुओं से किसी की शादी रचाना कानूनन अपराध है.'
इस घटना से एक बात स्पष्ट है कि आधुनिक कहे जाने वाले समाज में ऐसे चेहरे भी मौजूद हैं, जो अंधविश्वास में भरोसा करने की बड़ी भूल कर रहे हैं. यदि निमंत्रण पत्रों में सचिवालय कर्मी का नाम उसकी इजाजत पर छपा है तो मामला और संगीन बन जाता है.
-आजतक से साभार
बुधवार, जनवरी 19, 2011
कच्ची मिट्टी का 'चढ़ता सूरज धीरे धीरे'
मंच पर और मंच के परे भी नवांकुरों की अदभुत प्रस्तुति
शुभदा के बच्चों को कला अन्कुर का सहयोग
शुभदा नेटवर्क, अजमेर। कला और संगीत के क्षेत्र में सक्रीय कला अंकुर संस्था द्वारा आयोजित 'कच्ची मिट्टी' कार्यक्रम में उस समय सौंधी सुगंध का अहसास हुआ जब निशक्त बच्चों के लिए मदद का जज्बा सामने आया। संस्था की ओर से निशक्त बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था 'शुभदा' को व्हीलचेयर, ट्रैंपोलीन और फिजियो बॉल्स जैसे उपकरण दिए गए। उल्लेखनीय है कि विमंदित बच्चों को जीना सिखाने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए कार्यरत इस संस्था ने बहुत सीमित साधनों में भी बेहतर परिणाम प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख किया गया। इस दौरान कला अंकुर की जयपुर शाखा के पूर्व अध्यक्ष स्व। मानस चतुर्वेदी को श्रद्धांजलि भी दी गई। कमलेंद्र झा, रमेश, अनिल जैन, कुसुम शर्मा और अन्य पदाधिकारियों के अलावा कई गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
'चढ़ता सूरज धीरे धीरे'
इस कार्यक्रम के जरिए जवाहर रंगमंच में अजमेर के नन्हें कलाकारों ने भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई। संगीत, नृत्य और अभिनय पर आधारित इस कार्यक्रम में मंच पर और मंच के परे सभी किरदार बच्चों ने ही निभाए। इस मौके पर कला अंकुर ने 'शुभदा' से जुड़े बच्चों की मदद के लिए हाथ बढ़ा कर आयोजन का गौरव दो-गुना बढ़ा दिया।
पूर्णिमा तोषनीवाल के संयोजन और परिकल्पना पर आधारित संगीत संध्या 'कच्ची मिट्टीÓ के जरिए इस आयोजन में संस्कारों के संदेश मिले। कार्यक्रम की शुरुआत 'कला अंकुर गीतÓ से की गई। जिसे पारुल और साथियों ने कराओके ट्रेक पर प्रस्तुत किया। इसके बाद भावपूर्ण गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हमÓ पेश किया अंशिता शर्मा और साथियों ने। प्रस्तुति में खास बात थी कि गीत पेश करने वाले सभी कलाकार नन्हें थे, आर्केस्ट्रा पर संगत देने वाले भी नन्हें साधक ही थे। देवयानी पारिक ने शिव की महिमा 'मैं ही शिव हूं' के जरिए सर्वधर्म की अवधारणा के संस्कार देता गीत शिवोह पेश किया। इस मौके पर मेयो गल्र्स स्कूल की छात्राओं ने भी पाश्चात्य और भारतीय शैली के नृत्यों की प्रस्तुति दी। संस्कार पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों ने भी 'धरती माता' शीर्षक पर शानदार देश प्रेम से पूर्ण स्कीट पेश की। इस प्रस्तुति में पर्यावरण, पानी बिजली बचाने का संदेश दिया गया। इसके बाद 'चढ़ता सूरज धीरे धीरेÓ माहेश्वरी पब्लिक स्कूल के छात्रों ने पेश किया। शास्त्रीय संगीत पर आधारित नृत्य गीत, सितार, तबला व जलतरंग पर राग हंस ध्वनि की प्रस्तुतियां भी दी गईं।
मंगलवार, जनवरी 18, 2011
जयपुर में आमेर पर्यटन ? ना बाबा ना...

मॉन्यूमेंट्स पर एंट्री है जबर्दस्त चैलेंज
फिजिकली चैलेंज्ड को कुछ स्थानों पर व्हील चेयर उठाकर सीढिय़ां पार कराई जाती हैं
शहर के सभी मॉन्यूमेंट्स पर नहीं है फिजिकली चैलेंज्ड के लिए रैंप व्यवस्था
पर्यटन स्थलों पर सैर के साथ रोमांच का भी अपना मजा है, लेकिन फिजिकली चैलेंज्ड पर्यटकों के सामने सबसे बड़ा एडवेंचर तो उनका इन स्थानों में प्रवेश करना है। वजह है रैम्प की कमी। जयपुर शहर में रोज लाखों रुपए की आय कराने वाले ज्यादातर मॉन्यूमेंट्स पर फिजिकली चैलेंज्ड लोगों के रैम्प नहीं बने हुए। ऐसे कई पर्यटकों को व्हीलचेयर के साथ उठाकर सीढिय़ां तय करानी पड़ती हैं। इसमें रिस्क इतना है कि अगर थोड़ा भी चूके तो पर्यटक को ज्यादा नुकसान हो सकता है। हालात ये हैं कि विभाग ने अल्बर्ट हॉल पर तो लकड़ी का रैम्प बनाकर ऐसे लोगों को राहत दी है वहीं आमेर जैसे पर्यटन के सबसे प्रमुख स्थान पर कुछ समय पहले गणेशपोल के दोनों ओर बने रैम्प को तोड़ दिया गया।
सिर्फ आमेर ही नहीं, यह स्थिति लगभग सभी मॉन्यूमेंट्स की है। बात अगर आमेर से शुरू की जाए तो वहां पर कुछ समय पहले गणेश पोल के दोनों ओर रैम्प बने हुए थे, लेकिन दीवाने आम के सामने जब रेस्टोरेशन वर्क हुआ तो रैम्प को तोड़कर हटा दिया गया। अब पर्यटकों को व्हीलचेयर उठाकर सीढिय़ां पार करनी पड़ती हैं, ऐसे में हमेशा चोट लगने का खतरा बना रहता है। यहां प्रवेश का सबसे अहम रास्ता ही गणेशपोल है। उसी तरह पहले सुखनिवास से शीशमहल के बीच रैंप बना था जिसे भी तोड़ दिया गया। जब इस बारे में वहां के सुपरिंटेंडेंट जफरउल्लाह खान से पूछा गया तो वे कहते हैं कि महल में जहां भी इसकी जरूरत है वहां रैम्प बने हुए हैं। जलैब चौक से सिंघपोल गेट, सिंघपोल गेट के अंदर से दीवाने खास, दीवाने खास से मानसिंह महल तक रैम्प बने हुए हैं, लेकिन गणेश पोल के रैम्प के बारे में उन्हें लगता है वहां इसकी जरूरत ही नहीं है। वैसे महल में फिजिकली चैलेंज्ड लोगों के लिए बना रैम्प शिलामाता मंदिर का प्रवेश द्वार ही जिसे महल प्रशासन अपना मानते हैं लेकिन वो इस तरह से बना हुआ है कि थोड़ी सावधानी हटी आदमी लुढ़ककर सीधा जलेबचौक तक पहुंच जाएगा। हाल ही में इस रास्ते को मंदिर के ठीक सामने से सीढिय़ां हटाकर महल से जोड़ा गया है जो बहुत ही ज्यादा ढलान वाला है जहां से आना-जाना सहज नहीं है।
सोमवार, दिसंबर 06, 2010
चमत्कार से भरपूर होते हैं विशेष बच्चे
बच्चों का काम बच्चे ही करें तो बेहतर है, लेकिन बड़े बड़ों का काम अगर वे चंद सैकंड में कर दें तो कहलाएंगे न स्पेशल। जयपुर शहर के एनजीओज में पढ़ाई और ट्रेनिंग कर रहे इन स्पेशल चिल्ड्रन का एक्स्ट्राऑर्डिनरी टैलेंट किसी अजूबे से कम नहीं। पिछले दिनों स्पेशल चाइल्ड के लिए शुरू हुई डिस्ट्रिक्ट लेवल स्पोट्र्स मीट में जब इन से मुखातिब हुए तो इनकी काबिलियत का अंदाजा लगा। हर के पास ऐसा हुनर था, जो आश्चर्यचकित कर गया। इनकी यह काबिलियत इन्हें वाकई स्पेशल बनाती है। जिसका
शायद उन्हें भी कभी अंदाजा नहीं था।अमित है या कैलेंडर
पिछले साल आपका जन्मदिन किस वार को था और अगले साल कौनसे वार को पड़ेगा, यह निर्मल विवेक स्कूल के स्टूडेंट अमित गुप्ता से चुटकियों में जान सकते हैं। उन्हें सन 2009, 2010 और 2011 का कैलेंडर बिना किसी कैल्कुलेशन मुंह जबानी याद है। वे किसी भी महीने की कोई भी तारीख का वार एक सैकंड के अंदर बता देते हैं। पिता अशोक गुप्ता बताते हैं, 6 साल के अमित को फीवर के बाद माइनर फिट्स आते थे। अवेयरनैस की कमी के चलते उसकी यह बीमारी बढ़ती गई, लेकिन इसकी याद करने की क्षमता ने इस बीमारी पर विजय पा ली और इसमें ये हुनर डवलप होने लगा।
बने रहना है नंबर वन
उंगलियों से हर टूर्नामेंट के लिए पूछे गए सवाल के जवाब में बस नंबर 1 का ही इशारा मिल रहा था। जब उससे इशारों में ही पूछा गया कि तुम आगे क्या नया करना चाहती हो? तो उसकी वही एक उंगली नंबर वन के लिए सामने आई। यह थीं अपने अधिकांश टूर्नामेंट्स में गोल्ड जीतने वाली ऑल राउंटर शतरंज और कैरम खेलने वाली अंजू जांगिड़। बोल और सुन नहीं पाने का दुख अंजू को जरूर होगा, लेकिन किसी भी अन्य खिलाड़ी से ज्यादा उनकी आंखों में जीतने की खुशी है। अंजू हैदराबाद, इंदौर और बैंगलुरू में हुए शतरंज टूर्नामेंट में गोल्ड जीत चुकी हैं। वहीं कैरम कॉम्पिटीशन में भी मुंबई में उसने गोल्ड पर कब्जा जमाया था।
नॉन स्टोप पेंटिंगफ्री हैंड स्केचिंग (बिना रुके और काट-छांट) बनाने वाली प्रयास संस्थान की रहनुमा को सुनने में दिक्कत है। उन्हें इस टैलेंट के लिए इंडियन काउंसिल की ओर से बाल भवन में सिल्वर मैडल से नवाजा है। प्राइज डिस्ट्रिब्यूशन थीम पर बनाई गई पेंटिंग ने लोगों को काफी इम्प्रैस किया, जिसकी वजह से उन्हें ये अवॉर्ड मिला। इंस्ट्रक्टर ऊषा गौतम के अनुसार, रहनुमा की इस गॉड गिफटेड क्रिएटिविटी को अच्छे मंच पर ले जाने के लिए प्रयासरत हैं।
शुक्रवार, सितंबर 03, 2010
हमारे बाद क्या होगा?

मंगलवार, जून 08, 2010
अब सड़क से संचालित होगी लड़ाई
नजर को बदलो, नजारे बदल जाएंगे।
जरुरत नहीं है किश्ती बदलने की,
दिशाओं को बदलो किनारे बदल जाएंगे।
राजस्थान राज्य के नि:शक्तजन आयुक्त खिल्लीमल जैन अगले महीने की चार तारीख को अपने पद से सेवामुक्त हो जाएंगे। इसके बाद भी वे नि:शक्तजन के लिए सक्रीय रहेंगे और वे सब कार्य सम्पन्न करेंगे जो वे पद पर रहते हुए पद की सीमाओं और मर्यादाओं के कारण नहीं कर पा रहे थे। उन्होंनें सन् 2007 को जुलाई माह की पांच तारीख को आयुक्त के रूप में पद ग्रहण किया था। उनका कार्यकाल तीन वर्ष का था।
जैन ने यह संकेत दिए हैं कि नि:शक्तजन कल्याण क्षेत्र में अभी बहुत कुछ सही होना शेष है। सरकारी काम का ढर्रा और पद की कुछ सीमाएं होने के कारण ऐसा बहुत कुछ है जो वे पूरा नहीं कर पाए, जो होना चाहिए। उनसे जब यह जानना चाहा कि जब पद पर पावर में रहते हुए भी वे जो कार्य नहीं कर पाए वे पद से हटने के बाद कैसे संभव होंगे? जैन ने अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट की ओट में संकेत दिया कि 'ऐसे बहुत से कार्य होते हैं जो सचिवालय में बैठकर नहीं किए जा सकते, लेकिन वह स्टैच्यू सर्किल पर बैठक ज्यादा आसानी से किए जा सकते हैं।
बात का खुलासा किए जाने के आग्रह को टालते हुए जैन ने कहा कि समय आने पर सब स्पष्ट हो उन्होंने कहा कि नि:शक्तजन के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। ऐसा बहुत कुछ है जो अब तक हो जाना चाहिए था, लेकिन सरकार की सुस्त चाल और सकारात्मक सोच के अभाव में नहीं हो पाया है। हाल ये है कि दो माह पहले ही विकलांगों से प्रमाणपत्र देने के लिए फीस नहीं वसूलने के आदेश किए गए थे, लेकिन अस्पताल प्रशासन इसे लागू करने में कोताही बरत रहा लगता है। ऐसे अनेको उदाहरण हैं। अब सीट पर बैठकर जारी किए अपने ही आदेशों को लागू कराने के लिए सड़क पर बैठना होगा।
जैन कहते हैं:
गम में अगर एक खुशी ढूंढ सको
आंसू में अगर एक हंसी ढूंढ सको
गैरों में अगर एक अपना ढूंढ सको
तो तुमसे मेरा यह वादा रहा...
जीने का सहारा मिल जाएगा।
सोमवार, जून 07, 2010
कुछ तो फर्क पड़ेगा...
कुछ तो फर्क पड़ेगा...एक लड़की सुबह समुद्र की सैर को निकली। उसने देखा सैंकड़ों मछलियां लहरों के साथ तट पर आ जाती हैं और उनमें से अनेक किनारे पर ही छूट जाती हैं, कुछ देर बाद बिना पानी के धूप में मर जाती हैं। जब लहरें ताजी और मछलियां जीवित थी, तभी उसने कुछ तय किया। उसने एक मछली उठाई और पानी में फेंक दी। उसके पीछे एक आदमी और था, वह बोला- यह तुम क्या कर रही हो? तुम कितनों को बचा सकोगी? इससे क्या फर्क पड़ेगा? उस लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। दो कदम बढ़कर एक और मछली को उठाकर पानी में डाल दिया और बोली- 'इससे एक को तो फर्क पड़ता है। सब लोग थोड़ा-थोड़ा फर्क लाएं तो बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा।
रविवार, जून 06, 2010
लर्निंग डिसेबिलिटी? ये हैं सोल्यूशन्स!
लगभग 30 फीसदी बच्चे लर्निंग डिसेबिलिटी से पीडि़त हैं। इसके बावजूद ज्यादातर पेरेंट्सइस बारे में अवेयर नहीं हैं। इंग्लिश के तकनीकि शब्द अधिक होने के कारण इस आलेख की भाषा कुछ ऐसी हो गई है जैसे अंग्रेजीदां एनजीओज़ द्वारा संचालित स्पेशल स्कूल्स में पेरेंट्स से बोली जाती है। यहां किसी की नकल करने या मजाक उड़ाने की मंशा कतई नहीं है।बच्चों की ओर से बार-बार गलतियां करने पर पेरेंट्स उसे लापरवाही समझ लेते हैं और उन्हें डांटना शुरू कर देते हैं, जबकि वे इस बात से अन्जान होते हैं कि उनका बच्चा लर्निंग डिसेबिलिटी से पीडि़त है। यह एक जैनेटिक प्रॉब्लम है। एक्सपट्र्स के मुताबिक लगभग 30 फ ीसदी बच्चे इस समस्या से पीडि़त हैं। ऐसे बच्चे अवसर मिलने पर बेहतर परफॉर्म नहीं कर पाते। इसके बावजूद ज्यादातर पेरेंट्स इस बारे में अवेयर नहीं है।
बेस्ट आउटपुट नहीं दे पाता है बच्चा :बच्चा स्कूल या घर में मिलने वाली गाइडलाइन के मुताबिक उम्मीद के मुताबिक बेस्ट रिजल्ट नहीं दे पाता है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रो। और सायकेट्रिस्ट डॉ. ललित बत्रा कहते हैं, लर्निंग डिसेबिलिटी कई तरह की होती है। इसमें जैसे कैल्कुलेशन, ए सप्रेस, राइटिंग, आइडेंटिफाई न कर पाना आदि हैं। डॉ. बत्रा कहते हैं, सही समय पर स्पेशल और डिफ्रेंट एजुकेशन के जरिए बच्चे को सही किया जा सकता है।
नॉर्मल होता है आई क्यू लेवल: लर्निंग डिसेबिलिटी होने पर बच्चों में रीडिंग राइटिंग और कैल्कुलेशन की प्रॉ लम होती है। मेडिकल लैंग्वेज में इन्हें एसेक्सिया, एकेल्कुएलिया और एग्राफिया कहा जाता है। फोर्टिस हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट और लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ। सविता जगावत कहती हैं, यह एक जन्मजात समस्या है। जब तक बच्चों का सामना रीङ्क्षडग या राइटिंग से नहीं होता, तब तक यह समस्या न तो पेरेंट्स के सामने आती है और न ही बच्चों के। अमूमन सेकंड या थर्ड स्टेंडर्ड में यह समस्या शुरू होती है। लर्निंग डिसेबिलिटी होने के कारण वे बोलने, लिखने और पहचानने में कैपेबल नहीं होते। हालांकि उनका आई क्यू लेवल नॉर्मल होता है, लेकिन पूछे गऐ क्वैश्चन का आन्सर देने में बच्चे सक्षम नहीं होते। इसे आर्टिकुलेशन कहा जाता है। इसमें बच्चे को नए वर्ड और स्पेलिंग्स समझने में दिक्कत आती है। इसमें स्पेशल एजुकेटर डिफ्रेंट तरीके और प्रैक्टिकल मैथड से बच्चों को पढ़ाते हैं।
पेरेंट्स का ध्यान देना जरूरी : ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों के लर्निंग डिसएबिलिटी से पीडि़त होने की बात समझ नहीं पाते। मॉडर्न सोसायटी और हैक्टिक वर्क शेड्यूल के चलते आजकल पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता, जबकि लर्निग डिसएबिलिटी से पीडि़त बच्चों को पेरेंट्स के एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है। यदि पेरेंट्स धैर्य और समझदारी से काम लें तो काफी हद तक ऐसे बच्चों की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है।
ये हैं सोल्यूशन्स- अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों के साथ न करें। पेरेंट्स का कंपेयरेटिव बिहेवियर उनमे हीन भावना पैदा कर सकता है।
- पेरेंट्स हालात को समझें। बार-बार डांटने से बच्चा कॉन्फिडेंस खो देता है और निराश हो जाता है। इसलिए उन्हें डांटने के बजाय ह्रश्वयार से पेश आएं।
- ऐसे बच्चों के इलाज के लिए पीडियाट्रिशियन, सायकियाट्रिस्ट, रेमिडियल एजुकेटर, आक्यूपैशनल थैरेपिस्ट से सजेशन लें। केवल एक व्यक्ति की राय लेकर इलाज शुरू न करें।
- इलाज के दौरान स्पेशल एजुकेटर से थैरेपी सीखें और फिर बच्चों के साथ समय बिताएं।
बच्चों को मिलती है विशेष छूट: ऐसे बच्चों को गवर्नमेंट की ओर से एग्जाम में विशेष छूट दी जाती है। जैसे एग्जाम में एक्स्ट्रा टाइम मिलना, कैल्कुलेटर का इस्तेमाल, ओरल एग्जाम देना। इसके लिए गवर्नमेंट हॉस्पिटल का सर्टिफिकेट होना जरूरी है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे अपने बच्चों को यह अधिकार जरूर दिलवाए।
ऐसे पहचानें प्रॉब्लम:
- यदि बच्चा देर से बोलना शुरू करे
- साइड, शेप व कलर को पहचानने में गलती करे।
- प्रनन्सिएशन और लिखने में गलती करे।
- आपकी ओर से दिए गए ऑर्डर्स को याद रखने में उसे मुश्किल महसूस हो।
- अर्थमेटिक के नंबरों को पहचानने में गलती करे।
- बटन लगाने या शू के लैस बांधने में दि कत हो।
- लर्निग डिसएबिलिटी एक जैनेटिक प्रॉब्लम है। यदि पेरेंट्स में से किसी एक को यह समस्या है, तो बच्चों में इसके होने की आशंका अधिक होती है।
- बच्चे के जन्म के समय सिर पर चोट लगने या घाव होने के कारण भी डिसएबिलिटी हो सकती है।
- जो बच्चे प्रीमैच्योर होते हैं या जन्म के बाद जिनमें कुछ मेडिकल प्रॉब्लम होती है।
शनिवार, अप्रैल 24, 2010
ज्वैलरी बना के चमके 'तारे'
'शुभदा' में प्रशिक्षित मानसिक विमंदित युवाओं ने कर दिखाया 70 दिन में सीखी ज्वैलरी बनाने की कला और पाई इसके व्यवसाय की जानकारी
मानसिक विमंदितों के लिए 'शुभदा' द्वारा चलाए गए ज्वैलरी मैकिंग के एक प्रशिक्षण शिविर में 10 मानसिक विमंदित युवाओं ने 15 अपै्रल को अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया। इसी के साथ इस बात पर फिर मोहर लग गई कि अगर मानसिक विमंदितों को उचित तरीके से प्रशिक्षण दिया जाए तो वे वास्तव में अपनी आजीविका कमाने में सक्षम हो सकते हैं।
इस प्रशिक्षण आयोजन के समन्वयक अपूर्व ने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 16 जनवरी 10 को शुरू किया गया था। इसके लिए प्रशिक्षकों और फिजीओथैरेपिस्टों द्वारा विमंदित युवाओं के लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया। क्षेत्रीय पार्षद श्रीमती मंजू सुराणा की मौजूदगी में आरम्भ हुए इस प्रशिक्षण में प्रथम चरण के लिए 10 युवाओं को चुना गया था। इसमें मेल-फीमेल दोनों को शामिल किया गया था। शुरू में यह कार्य काफी कठिन प्रतीत हो रहा था, लेकिन असंभव नहीं।
आखिर में प्रशिक्षकों और प्रशिक्षु युवाओं ने इसे संभव कर दिखाया। प्रशिक्षण के समापन अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में ज्वैलरी व्यवसायियों, जन प्रतिनिधियों और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच प्रशिक्षु युवाओं ने आगंतुकों के समक्ष तरह तरह की ज्वैलरी का निर्माण करके दिखाया। इसके बाद युवाओं को हाथों-हाथ उनके उत्पादों के लिए आर्डर भी मिले। इन युवाओं के लिए बैंक में खाते खुलवा कर व्यवसाय को व्यस्थित किए जाने के प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रमुख समाजसेवी श्रीमती किरण शारदा ने इन युवाओं के लिए स्वयं सहायता समूह गठित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया। क्षेत्रीय पार्षद श्रीमती मंजू सुराणा के अनुसार ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की मानसिक विमंदित युवाओं के पुनर्वास के लिए महत्ती आवश्यकता है।
इस प्रशिक्षण से रूबरू हुए पूर्व विधायक नरेन साहनी, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी।आर।पंडत, अजमेर के प्रतिष्ठित शेयर व्यवसायी कपिल कर्नावट, महिन्द्रा के प्रतिनिधि भगवत प्रसाद राठी, कला अंकुर संस्था की अध्यक्षा श्रीमती स्नेहलता शर्मा और सचिव श्रीमती माधवी स्टीफन सहित अनेक गणमान्य लोगों ने मानसिक विमंदित युवाओं के इस प्रयास को सराहा। इन लोगों ने प्रशिक्षुओं को आजीविका योग्य संबल प्रदान करने का आश्वासन भी दिया।
प्रमुख प्रशिक्षक श्रीमती सुप्रभा कविराज ने प्रशिक्षण की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत किया और आगामी बैच के लिए की गई तैयारियों की जानकारी दी। विशेष प्रशिक्षक श्रीमती सरोज और फिजीयोथैरेपिस्ट डा। प्रदीप शर्मा ने बताया कि विमंदित युवाओं के लिए तैयार किया गया यह पाठ्यक्रम सफल रहा है। इसमें समय-समय पर प्रशिक्षुओं की जरूरतों के मुताबिक और सुधार किए जाने के द्वार खुले हैं।
'मूमल' का सपोर्ट
कला और शिल्प जगत में प्रतिष्ठित 'मूमल' संस्थान ने विमंदितों की आजीविका और पुनर्वास के लिए 'शुभदा' की ओर से किए जा रहे प्रयासों में सक्रीय भागीदारी का करार किया है। इसके तहत मूमल की ओर से आजीविका कौशल विकसित करने के विभिन्न कार्यक्रमों में तकनीकि सहयोग प्रदान किया जाएगा। इसके साथ ही प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ फैकेल्टी के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे। यह सभी प्रशिक्षक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पी होंगे
बुधवार, मार्च 31, 2010
केन्द्र बोले पेंशन, राज्य देवे टेंशन
आहत करे राहत
विमंदित और बधिरों को विकलांग मानने या न मानने पर विवाद
राजस्थान में मानसिक विमंदित और बधिरों को विकलांग मानने या न मानने पर विवाद हो गया है। विवाद के चलते जहां करीब 30 हजार लोगों की पेंशन रोक दी गई है, वहीं करीब ढाई लाख लोगों के विकलांगता के प्रमाण पत्रों के बेकार हो जाने का खतरा हो गया है।
सरकार ने नि:शक्तजनों की पेंन्शन का दायरा बढ़ाकर दृष्टिहीनों और चलन नि:शक्ततों के साथ अन्य नि:शक्तजनों को भी इसमें शामिल तो कर लिया, लेकिन उम्र का ऐसा भेद कर दिया कि उनके लिए नई परेशानी खड़ी हो गई। यही नहीं, उनके लिए बीपीएल होने की अनिवार्यता भी जोड़ दी है जिससे सैकड़ों लोगों को पेन्शन से वंचित ही रहना पडेगा।
केन्द्रीय नि:शक्तजन अधिनियम-1995 में मानसिक विमंदितों और बधिरों को नि:शक्तजन की श्रेणी में रखा गया है, वहीं राज्य के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने इन दोनो श्रेणियों को गैर नि:शक्त कहते हुए सरकारी फायदे देने से इन्कार कर दिया है। विभाग की लेखा शाखा ने उन सभी मानसिक विमंदितों व श्रवण बाधितों की करीब एक साल पूर्व इस आधार पर पेंशन रोक दी कि ये नियमानुसार सहीं नहीं है और ये दोनो श्रेणियां इसकी हकदार नहीं है।
विवाद होने पर पिछले साल राजस्थान सरकार ने नि:शक्तों से सम्बन्धित मसलों पर उच्च स्तरीय कमेटी गठित की है। कमेटी के विभाग के प्रमुख शासन सचिव के साथ ही चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, मेडिकल शिक्षा और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को शामिल किया गया है। अब तक यह कमेटी यह स्पष्ट नहीं कर सकी है कि दोनो श्रेणियां विकलांगता की श्रेणी में आते है या नहीं? वहीं इस मुद्दे को लेकर नि:शक्तजन क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि कई बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिल चुके है, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
जिस कानून के तहत नि:शक्तजनों को पेन्शन का सहारा दिया जा रहा है, उसका नाम तो नि:शक्तजन समान अवसर अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी है, लेकिन असलियम में हो कुछ और ही रहा है। 15 जनवरी से पहले तक राज्य में केवल दृष्टिहीन व चलन नि:शक्तों को ही पेंन्शन मिल रही थी। इसके बाद से मानसिक विमंदित, बधिर, कमजोर दृष्टि, कुष्ठ रोग मुक्त नि:शक्तों व मानसिक रूग्णता से पीडि़तों को भी पेन्शन का लाभ दे दिया गया है। लेकिन शर्त जोड़ दी कि पेंशन के लिए उनका 18 वर्ष की आयु पार होने के साथ ही बीपीएल होना अनिवार्य कर दिया गया। जबकि दूष्टिहीन व चलन नि:शक्तों के मामले में न्यूनतम उम्र 8 वर्ष है उम्र के साथ ही बीपीएल होने की अनिवार्यता कर दी गई, जिससे सैकड़ों नि:शक्तजन आवेदन से ही वंचित हो गए है ऐसे में नि:शक्तों का कहना है कि नई बीपीएल सूची बनने में अभी वक्त लगेगा, तब तक ये क्या बिना पेन्शन के ही बैठै रहेंगे?
गुरुवार, मार्च 18, 2010
.....तब तो यह आपके लिए नहीं।
यही कारण रहा कि मैं हताश होकर लगातार कई-कई दिनों तक ब्लॉग की इस दुनियां से लापता रही। ब्लॉगर भाई-बंधु गर्भावस्था के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां पढ़ते समय भी मनोरंजन या कौतुक की तलाश में ही नजर आए। इस संबध में लिखे आधा दर्जन से अधिक लेखों में केवल उसी एक लेख को पाठक मिले जिसमें गर्भावस्था के दौरान सैक्स के संबंध में चर्चा की गई। ऐसे में मेरा साहस भी जवाब दे गया और नतीजतन आपकी इस दुनियां से दूरियां बढ़ती गई। जाहिर है आप यह सवाल कर सकते हैं कि '...तो फिर अब क्या लेने आई हो?Ó
जवाव यही है कि मुझे लगा सभी तो एक जैसे नहीं होंगे, कभी तो कोई ऐसे नीरस विषय के लिए भी उत्साहमय वातावरण बनाने को आगे आएगा। कोई तो होगा जो इस मसले पर ऐसे विकलांग ब्लॉग के लिए केवल 'हाय बेचाराÓ बोल कर अगला ब्लॉग तलाशने के लिए आगे बढऩे के बजाय ठिठककर इनकी बात सुनेगा। वास्तव में ऐसे विशेष बच्चे ज्यादा संतुलित व्यवहार का हक रखते हैं, ताकि वे विकलांगता में अपनी जिन्दगी जी सकें।
आम तौर पर एक विकलांग अपने आप में कई विकलांगों का एक समूह होता हैं। सच तो यह है कि विकलांगता केवल विकलांग ही नहीं भोगता। एक सदस्य घर में विकलांग क्या हुआ, सारा परिवार ही विकलांग हो जाता है। पूरा परिवार अपने दुर्भाग्य पर रोता है। बहुत से लोग इस पर अपना व्यवहार भी सामान्य नहीं रख पाते। वे या तो इनकी उपेक्षा करने लगते हैं या फिर ज्यादा लाड़-दुलार कर अन्जाने ही उन्हें भावनात्मक रूप से अधिक लाचार बना जाते हैं। जबकि उन्हें सामान्य और संतुलित व्यवहार की अधिक दरकार होती है।
तो मित्रों नव संवत्सर पर एक बार फिर नई उम्मीदों के साथ आपके बीच आपके बीच यह नीरस विषय लेकर उपस्थित हूं। तुलसीदास जी कह है न - 'धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी।Ó
इति आपकी 'शुभदाÓ








